-कृष्णन बी.
संसद के शीतकालीन सत्र के अंतिम समय में केंद्रीय सरकार द्वारा ट्रेड यूनियन एक्ट-1926 में संशोधन बिल पेश किया है। यह बिल केंद्रीय सरकार को केंद्रीय ट्रेड यूनियनों को मान्यता प्रदान करने से संबंधित शक्तियां प्रदान करता है। सरकार का दावा है कि इससे त्रैपक्षिय वार्ताओं में पारदर्शिता आयेगी, नामजदगियों के मामले में मनमानी पर रोक लगेगी तथा कानूनी विवादों में कमी आएगी।
यह बिल संसदीय सत्र के समाप्त होने से ठीक पहले पेश किया गया ताकि संसद सदस्यों को इस पर गंभीर विचार-विमर्श करने का समय न मिल सके। इसे सलैक्ट कमेटी को भेजने की मांग को रद्द कर दिया गया। इस बिल के पारित होने पर भारत के संविधान की धारा 19(1)(सी), धारा 23 व धारा 24 द्वारा प्रदत अधिकारों की गारंटी का क्षरण होगा। इससे केंद्रीय ट्रेड यूनियनों की मूल धारणा ही तबदील हो जाएगी, उन्हें मान्यता प्रदान करने तथा सरकार व ट्रेड यूनियनों के बीच आपसी विचार-विमर्श की स्थापित प्रक्रिया को अलविदा कह दिया जाएगा। परिभाषा व मान्यता में बहुत सी तबदीलियां हो जाएंगी। मालिकों द्वारा ट्रेड यूनियन को मान्यता प्रदान करने का अधिकार समाप्त हो जाएगा। यदि यह बिल वर्तमान रूप में पारित होता है तो श्रमिक वर्ग का सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार व ट्रेड यूनियन संगठित करने का अधिकार अनिश्चितता के घेरे में आ जाएंगे। हमें एकजुट होकर पूरी शक्ति से इसके प्रतिरोध करना चाहिए।