मंगत राम पासला
भारत, भिन्न-भिन्न धर्मों, जातियों, संप्रदायों व संस्कृतियों वाले लोगों का देश है। यहां बसने वाली बहुसंख्या हिंदु धर्म के अनुयायी भी, हिंदू धर्म के भिन्न-भिन्न धार्मिक संप्रदायों, रीतियों व रस्म-रिवाजों के बीच बंटे हुये हैं। यह बहुत चिंता का विषय है कि इसके बावजूद आरएसएस द्वारा हिंदूत्ववादी विचारधारा के अनुसार, भारत को एक धर्म आधारित देश-हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने का बीड़ा उठाया गया है। ऐसा बदलाव साम्राज्यवाद निर्देशित नवउदारवादी नीतियों के अलंबरदार विदेशी व देशी कार्पोरेट घरानों के लिये भी लाभदायक है, क्योंकि लोगों को शोषण की चक्की में पीसने के लिये एक ‘मजबूतÓ व गैर-जनवादी सरकार के अंतर्गत ही उनके हित पूरी तरह सुरक्षित रह सकते हैं। आने वाले दिनों में देश के लोगों को एक ओर नवउदारवादी आर्थिक नीतियों से पैदा होने वाले संताप को झेलना पड़ेगा तथा दूसरी ओर सांप्रदायिक फाशीवादी शक्तियों ने अपने सांप्रदायिक ऐजंडे के अनुरूप देश की बहुराष्ट्रीय सामाजिक संरचना व सांस्कृतिक विभिन्नताओं को मिटाने का प्रयत्न करना है। इससे यहां गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी आदि दीर्घ रोग पहले से भी कहीं अधिक गंभीर व घातक रूप धारण कर लेंगे। ‘हिंदू राष्ट्रÓ कायम करने को लालायित सांप्रदायिक फाशीवादी शक्तियों द्वारा अपने निर्धारित ऐजंडे के अंतर्गत धार्मिक अल्पसंख्यकों (विशेषकर मुसलमानों), औरतों, दलितों, व कम्युनिस्टों (समस्त प्रगतिशील लोगों सहित) को अपनी सांप्रदायिक हिंसा का निशाना बनाया जायेगा। मोदी सरकार के पुन: सत्ता संभालने के तुरंत बाद ही इन कुत्सित शक्तियों द्वारा इस कार्ययोजना पर तेजी से अमल शुरू हो चुका है। इसलिये अवश्य ही समस्त पीडि़त वर्गों ने आने वाले समय में अपने हितों की रक्षा के लिये तथा एक सम्मानीय जिंदगी गुजारने की इच्छा से प्रेरित होकर मोदी सरकार के विरुद्ध संघर्षों का मैदान संभालना है। इस तरह के संघर्ष शोषित जनता की आवश्यकता व मजबूरी बन जायेंगे, क्योंकि उनके पास अपने श्रम तथा अस्तित्व की रक्षा करने का कोई अन्य रास्ता बचेगा ही नहीं।
बदली हुई परिस्थितियों में अपने हितों की रक्षा के लिये धार्मिक अल्प संख्यकों को और अधिक सतर्क, संवेदनशील, एकजुट व गंभीर होना पड़ेगा। क्योंकि आरएसएस के जन्मदाताओं (हेडग़ेवार व गोलवालकर जैसे नेताओं) ने प्रारंभ से ही देश में सनातनी विचारधारा के अनुरूप ‘हिन्दु राष्ट्रÓ कायम करने हेतु सारे सभी अन्य धार्मिक अल्प संख्यकों का अस्तित्व खत्म करने की कार्ययोजना तैयार की हुई है। सत्य तो यह है कि हिंदू, मुसलमान, ईसाई, जैनी, बौद्धी, सिक्ख इत्यादि समस्त अल्प संख्यक भाईचारों के लोगों नेे अपने-अपने धार्मिक विश्वासों, रस्मों-रिवाजों, संस्कृतियों व जीवन पद्धतियों के अनुसार जीवन जीते हुये भारतीय समाज को भिन्न भिन्न रंगों की एक खूबसूरत फुलवाड़ी का रूप दिया हुआ है। सभी धर्मों के आम लोग शांति व सद्भावना भरे वातावरण में जीना चाहते हैं। परंतु यह भी एक कटु सत्य है कि स्वतंत्रता के बाद से देश में राज करती भिन्न-भिन्न सरकारें व प्रमुख राजनीतिक पार्टियों, जो शोषक शासक वर्गों (पूंजीपति-सामंती) का प्रतिनिधित्व करती आ रही हैं, न अपनी सांप्रदायिक सोच व संकुचित राजनीतिक हितों की प्राप्ति के लिये कभी भी धार्मिक अल्पसंख्यक भाईचारे के लिये पूर्ण रूप में एक अजादाना, भयमुक्त व सम्मानजनक सामाजिक वातावरण प्रदान नहीं किया, जिसमें वे अपनी जीवन शैली का समुचित विकास कर सकें। देश में हुये अनेकों सांप्रदायिक दंगों में हमेशा धार्मिक अल्पसंख्यकों के खून की होली खेली गई है। दोष चाहे किसी पक्ष का भी हो, बहुसंख्यक भाईचारे व प्रशासन के निशाने पर हमेशा अल्पसंख्यक ही रहे हैं। सरकार द्वारा भिन्न-भिन्न समयों पर गठित किये गये जांच आयोगों ने भी अपनी रिपोर्टों में यू.पी. में हुये सांप्रदायिक दंगों में राज्य की पुलिस (पी.ए.सी.) के सदा ही मुस्लिम भाईचारे से भेदभाव भरे व्यवहार को नोट किया है। 1984 के सिक्ख विरोधी दंगे भी इसी कड़ी का एक भाग हैं। धार्मिक अल्पसंख्यकों की असुरक्षा की भावना का लाभ लेकर बड़े राजनीतिक दलों ने उन्हें इंसाफ देने की जगह हमेशा ‘वोट बैंकÓ के रूप में ही इस्तेमाल किया है, जबकि अल्पसंख्यक भाईचारे के जीवन के अन्य आर्थिक व राजनीतिक पक्षों को समझ कर व उनका विकास करने की ओर कभी भी विशेष रूप में अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। वैसे बाकि जनता की तरह ही देश की बड़ी बहुसंख्यक, हिंदु आबादी, की आर्थिक स्थिति भी काफी दयनीय बनी हुई है। परंतु धार्मिक अल्पसंख्यकों में से मुसलमानों व ईसाईयों की जिंदगी के समक्ष खड़े दुखों-दर्दों का तो अनुमान लगाना भी मुश्किल है। ऐसा निष्कर्ष धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को जानने के लिये गठित किये गये बहुत से आयोगों की रिपोर्टों (जैसे सच्चर आयोग) में भी दर्ज किया गया है।
बहुसंख्यकों के भीतरी मु_ी भर सांप्रदायिक तत्वों व लुटेरे शासकों द्वारा धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध किये जाने वाले साजिशी हमलों व ज्यादतियों से मुक्ति प्राप्त करके सुरक्षित व सम्माननीय जीवन जीने की इच्छा को कैसे पूरा किया जाये? यह प्रश्न समूचे जनवादी आंदोलन के समक्ष विचारणीय होना चाहिये। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये धार्मिक अल्पसंख्यकों से संबंधित लोगों के लिये भी अपनी सुरक्षा व विकास के मद्देनजर दरुस्त राजनीतिक व सामाजिक व्यवहार अपनाना अति आवश्यक है। आम तौर पर अल्पसंख्यकों के भीतरी प्रतिक्रियावादी व खुदगर्ज नेताओं के लिये अपने भाईचारे के हितों की रक्षा का नारा व दावेदारी पूरी तरह खोखली व एक पक्षीय होती है। ऐसे अधिकतर नेताओं के लिये यह एक लाभदायक धंधा भी है। आम तौर पर वे बहुसंख्या के सांप्रदायिक तत्वों का मुकाबला उनसे भी अधिक सांप्रदायिक, विषैली, प्रतिक्रियावादी व बदलाखोरी पर आधारित भाषा से करने की सलाह देते हैं। ऐसा व्यवहार निश्चय ही हानीकारक व उत्तेजना पैदा करने वाला है, जो समूचे अल्पसंख्यक भाईचारे के हितों के हमेशा विपरीत जाता है। इस धारणा से दोनों पक्षों के सांप्रदायिक व संकीर्ण तत्व एक दूसरे के सहायक व परिपूरक हो जाते हैं, जबकि दोनों पक्षों के साधारण लोग सांप्रदायिक हिंसा का शिकार होकर बड़ी विपत्तियों के अंधेरे कुंए में धकेले जाते हैं।
धार्मिक व सांस्कृतिक अल्प-संख्यक भाईचारे की रक्षा तथा उससे समानता आधारित व्यवहार की गारंटी करना समस्त वामपंथी व जनवादी शक्तियों का बुनियादी कत्र्तव्य है। यह किसी छोटे राजनीतिक या आर्थिक लाभ के लिये नहीं, बल्कि देश में सामाजिक बदलाव के लिये भी यह अति आवश्यक है; जहां समूचे मेहनतकश वर्ग के साथ मिलकर धार्मिक अल्पसंख्यकों ने अपनी अलग पहचान को कायम रखते हुये समानता व शोषण मुक्त समाज का निर्माण करने में अपना बनता योगदान देना है। यह समझदारी धार्मिक अल्पसंख्यकों के लोगों को भी अपने मन-मस्तिष्क में बनानी चाहिये कि अल्पसंख्यकों के सम्मान व सुरक्षा की गारंटी वास्तव में श्रमिकों-किसानों के संयुक्त राष्ट्रीय जनवादी आंदोलन की मजबूती में ही है। इसलिये जहाँ धार्मिक बहुसंख्यासे संबंधित आम लोगों को अपने बीच के सांप्रदायिक व अलगाववादी तत्वों का विरोध करने की आवश्यतकता है, उसके साथ ही अल्पसंख्यकों को भी अपनी कतारों के भीतर संकीर्णतावादी तत्वों से किनाराकशी करनी होगी। यदि वे ऐसी कार्यवाही या नारे का विरोध नहीं करते, जो मेहनतकश लोगों को सांप्रदायिक आधार पर एक दूसरे के विरोध में खड़ा करें या मेहनतकश लोगों की एकता को कमजोर करता हो, तब अवश्य ही बहुसंख्यकों के बीच के शरारती सांप्रदायिक तत्त्वों को समूचे अल्पसंख्यकों के विरुद्ध घृणा पैदा करने का सुनहरी मौका मिल जाता है। यह ठीक है कि किसी भी आतंकवादी, सांप्रदायिक व अलगाववादी तत्व को किसी विशेष धर्म या संप्रदाय से नहीं जोडऩा चाहिए। परंतु अपनी समाज विरोधी हरकत को छुपाने के लिए शरारती लोग धर्म की ओट लेकर अपने गुनाह को छिपाने का प्रयत्न करते हैं। जब संबंधित धर्म के अनुयायी ऐसे मु_ी भर सांप्रदायिक व शरारती तत्वों के विरुद्ध अपनी आवाज नहीं उठाते या अचेत रूप से उनके प्रति नरम रवैय्या अपनाते हैं, तो दूसरी ओर के समाज विरोधी सांप्रदायिक तत्वों को समूचे अल्प-संख्यकों की निंदा करने का अवसर प्राप्त हो जाता है। विश्व स्तर पर या देश में आतंकवादी व देशद्रोही कार्यवाहियां करने वाले सांप्रदायिक तत्व सारे ही धर्मों में मौजूद हैं। परंतु यह परिस्थितियों की देन ही समझी जाये कि वर्तमान समय में आतंकवादी कार्यवाहियों की सुई अधिकतर मुस्लिम धर्म से संबंधित व्यक्तियों की ओर ही जाती है। इसलिये अवश्यकता है कि जब भी कभी कोई दुखद: घटना घटे, समस्त मुस्लिम भाईचारे को एकजुट होकर शरारती तत्वों के विरुद्ध आवाज बुलंद करनी चाहिये। ऐसा करना संघ परिवार से संबंधित किसी सांप्रदायिक तत्व को संतोष प्रदान करने के लिये नहीं, बल्कि समूचे देशवासियों को समझाने के लिये है कि जिस आतंकवाद-अलगाववाद के प्रति वे चिंतित हैं, उतनी ही चिंता हमारे समाज के भीतर भी है। आतंकवादी तत्वों की सांप्रदायिक आधार पर की जा रही निशानदेही विश्व भर के आतंकवादी सरगने, अमरीकी साम्राज्यवाद, व उसके सहयोगी देशी लुटेरों के लोगों की दृष्टि से बचाने में मददगार बन रही है।
निस्संदेह, 1984 में देश भर में हुए सिक्ख विरोधी दंगे देश के शासक वर्गों की एक सोची समझी योजना के अंतर्गत हुये; जिन्होंने अपने प्रचार द्वारा भारतीय लोगों की दृष्टि में पंजाब के मु_ी भर खालिस्तानी तत्वों व आम सिक्खों को एक जैसे गुनाहगार बना दिया था। इस अति दुखद: घटना के पीछे क्रियाशील रही, कांग्रेसी सत्ताधारियों व संघ प्रचारकों की उस देश स्तरीय नीति को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिये जो कि सिक्ख भाईचारे को बदनाम करने की ओर निर्देशित थी। परंतु एक बात ध्यान मांगती है कि वे सब लोग, जो सिक्खों को जरूरतमंद व मजलूम लोगों के मददगार झमझते थे, इंदिरा गांधी के सिक्ख सुरक्षा कर्मचारियों के हाथों हुये उसके कत्ल के बाद रातो-रात सिक्खों के दुशमन कैसे बन गये? सिक्खों के प्रति ऐसा घृणा भरी दुर्भावना पैदा होने के पीछेे उन खालिस्तानियों आतंकवादियों की हिंसक कार्यवाहियों के साथ-साथ उनके समर्थन में तालियाँ पीटने वाले शरारती लोग व सिक्ख राजनीतिक नेताओं द्वारा अवसरवादी राजनीति से प्रेरित होकर खालिस्तानियों द्वारा निर्दोष लोगों के किये जाते कत्लों की स्पष्ट निंदा करते हुऐ उनसे अलगाव ना करने की नीति भी शामिल है। समूचे पंजाबियों व सिक्खों की जायज माँगों के प्रति पूर्ण समर्थन के साथ-साथ, यदि आम सिक्खों द्वारा खालिस्तानी आतंकवादियों से स्पष्ट अलगाव की पहुंच समय से अपनाई होती तो कांग्रेस पार्टी व संघ परिवार की समस्त साजिशों के बावजूद ना पंजाब में ह•ाारों निर्दोष लोगों की हत्यायें होतीं, ना श्री दरबार साहिब पर सैनिक हमला करने की हिम्मत इंदिरा गांधी की सरकार करती तथा ना ही 1984 में दिल्ली की सड़कों पर निर्दोष सिक्खों का खून बहता। उस समय कांग्रेस के शासन के साथ ही दिल्ली में आर.एस.एस. एक बहुत ही मजबूत शक्ति थी, जहां सिक्खों का कत्लेआम किया गया। जबकि पश्चिम बंगाल में कुछेक छोटी-मोटी घटनाओं के अतिरिक्त एक भी सिक्ख का ना शारीरिक तथा ना आर्थिक नुकसान हुआ। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि 1984 के इस अमानवीय घटनाक्रम को अभी भी बहुत से लोग अपने राजनीतिक हितों से प्रेरित एक पक्षीय व संकुचित दृष्टि से ही पेश करते हैं, जबकि आवश्यकता उस समय की स्थितियों को द्वंदवादी ढंग से विश्लेषित करने की है, ताकि आगे भविष्य में ऐसा काला दौर पुन: ना लौट सके। आज जबकि देश की सत्ता पर आर.एस.एस. के प्रति समर्पित मोदी सरकार बैठी है, तथा हिंदूत्ववादी शक्तियों ने धर्म-आधारित राष्ट्र कायम करने के लिये धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों, स्त्रियों व कम्युनिस्टों समेत सभी प्रगतिशील लोगों, साहित्यकारों, कलाकारों व बुद्धिजीवियों पर हिंसक व सैद्धांतिक हमलों को तेज कर दिया है, तब हमें इस तरह का संयुक्त स्टैंड अपनाने की जरूरत है, जो देश में वास्तविक धर्म निरपेक्ष व जनवादी ढांचे की रक्षा कर सके तथा सांप्रदायिक फाशीवादी शक्तियों को परास्त कर सके। इस उद्देशय को प्राप्त करने के लिये देश भर के समस्त लोगों को, जिनमें भारी संख्या में बहुसंख्यक हिंदू धर्म के अनुयायी भी हैं, ने जहां एकजुट होकर सांप्रदायिक फाशीवादी शक्तियों के विरूद्ध संघर्ष में अपना योगदान डालना है, वहीं देश के समूचे धार्मिक अल्पसंख्यकों ने भी अपनी सुरक्षा, सम्मान व अलग पहचान कायम रखने के लिये धर्म निरपेक्ष व जनवादी द्रष्टिकोण से प्रेरित देशव्यापी संयुक्त जनवादी आंदोलन के संग खड़े होना है। यह भी ध्यान रखना होगा कि धार्मिक अल्प संख्यकों के बीच के सांप्रदायिक, शरारती व देश विरोधी तत्व अपने घृणा भरे सांप्रदायिक प्रचार द्वारा स्थिति का लाभ लेकर धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच के साधारण लोगों को गुमराह ना कर सकें। सांप्रदायिक व अलगाववादी शक्तियां, चाहे वे किसी भी धर्म जाति, संप्रदाय व क्षेत्र से संबंधित हों, मेहनतकश लोगों की मित्र नहीं हो सकतीं। धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच के सांप्रदायिक व आतंकवादी तत्व भी स्वयं की गोद में छिपे उन सांपों की तरह हैं, जो उतने ही विषैले व खतरनाक हैं जितने कि भगवां बिग्रेड व शासक लुटेरे वर्गों के ‘भद्रपुरुषÓ।
(अनुवाद: रवि कंवर)