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‘‘पढ़ो, संगठित हो तथा संघर्ष करो’’-डाक्टर अंबेडकर

‘‘पढ़ो, संगठित हो तथा संघर्ष करो’’-डाक्टर अंबेडकर

डा. कर्मजीत सिंह
भारतीय इतिहास में ज्योतिबा फुले (1827-1890 ई.), आयनकली (1836-1941 ई.), पेरियार (1879-1973 ई.) बाबू मंगूराम मुग्गोवालिया (1886-1980 ई.) तथा डाक्टर अंबेडकर (1891-1956 ई.) ऐसे वैचारिक व संघर्षशील व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने हजारों वर्षों से गुलामों से भी बदतर जिंदगी जीने वाले भारतीय शूद्रों के लिए सारी उम्र लड़ाई लड़ी तथा उन्हें समाज में मान-सम्मान दिलवाने के प्रयत्न किए। इनमें से डाक्टर अंबेडकर तो दलितों के मसीहा के रूप में जाने जाते हैं। विचारक के रूप में तथा एक राजनीतिक नेता के रूप में डाक्टर अंबेडकर के बारे में विचार करना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि उनका अधिकतर लेखन समस्त मानवता के लिए होने के बावजूद उन्हें एक दलित नेता के रूप में ही मान्यता दी जाती है। यह कोई विलक्षणता भी नहीं है। भारतीय इतिहास में चारवाक, महात्मा बुद्ध तथा महावीर जैसे महापुरुषों के साथ भी ऐसा ही किया जाता रहा है। वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा कुछ होना संभव नहीं है, परंतु मनुवादी डाक्टर अंबेडकर की विचारधारा को पृष्ठभूमि में ले जाकर तथा उनकी मूर्तियों को आदर्श के रूप में पेश करने का प्रयत्न करते हैं। अनिता भारती का यह कथन इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है कि, ‘‘भीम राव अंबेडकर बड़े विद्वान थे जिन्होंने दलित शोषण, नारी शोषण, सामाजिक असमानता, बैंकों का राष्ट्रीयकरण तथा मानव अधिकारों जैसे तमाम राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर संघर्ष किया। परंतु अंबेडकर जैसे विद्वान को भी ब्राह्मणवादी लोगों ने दलित विचारक के रूप में ही देखा। ऐसे अनेक अनुभव हैं जब किसी मंच से अंबेडकर का नाम लिया जाता है तो नाम लेने वाले को जातिवादी घोषित कर दिया जाता है। यह बड़ी अजीब स्थिति है जहां किसी अंबेडकर जैसे बड़े विचारक को भी उसकी जाति से जोड़ कर देखा जा रहा है। परिणाम यह हुआ है कि दलित समाज ने भी अंबेडकर को अपना ही विचारक मान लिया है।’’ (नया पथ, अक्तूबर 2015-जून 2016, पन्ना 188)। हमें इससे ऊपर उठकर डाक्टर अंबेडकर की देन को विचारना चाहिए। विशेष रूप में प्रगतिवादी-माक्र्सवादी चिंतकों को और अधिक सचेत होने की आवश्यकता है।
दलित परिवारों में पैदा हुए चिंतकों को वे समस्त अपमान सहने पड़े हैं जो सदियों से समस्त शूद्र भाईचारा झेलता आ रहा था। अंबेडकर को भी छोटी आयु में ही ऐसे अपमानों का सामना करना पड़ा। विद्यार्थी अंबेडकर को कक्षा से बाहर टाट पर बैठ कर पढऩा पड़ा, शहर के स्कूल में उसे ब्लैक बोर्ड के पास जाकर लिखने की आज्ञा नहीं दी गई ताकि इसके पीछे रखे विद्यार्थियों के रोटी के डिब्बे दूषित न हो जाएं; बैलगाड़ी वाला पैसे लेकर भी गाड़ी में नहीं बैठाता बल्कि दूषित होने के डर से पैदल चलकर जाता है तथा सूबेदार का पुत्र डाक्टर अंबेडकर व उसका भाई खुद बैलगाड़ी हांक कर ले जाते हैं; महाराजा गायकबाड़ के कार्यालय में चपड़ासी उन्हें पानी पिलाने से इंकारी था तथा फाइलें मेज पर पटक कर जाता है। ऐसे अमानवीय व्यवहार के कारण डाक्टर अंबेडकर कुछ सप्ताह बाद ही नौकरी छोड़ देते हैं। समाज सुधारक उनके ब्राह्मणवाद विरोधी विचारों को सुनने के लिए तैयार नहीं होते। इन समस्त प्रतिगामी स्थितियों के बावजूद यदि डाक्टर अंबेडकर मानसिक मजबूती का परिचय देते हुए विदेश से पी.एच.डी. की पढ़ाई पूरी करते हैं, वायसराय की कार्यकारिणी के श्रमिक सदस्य बनते हैं, भारत के पहले कानून व न्याय मंत्री बनते हैं, संविधान निर्माण कमेटी के चेयरमैन बनते हैं तथा समता सैनिक दल, इंडिपैंडेट लेबर पार्टी व अनुसूचित जाति फैडरेशन का गठन करते हैं तो यह उनके व्यक्तित्व के उत्तम गुणों के कारण ही संभव हो सका है। 1927 ई. तक डाक्टर अंबेडकर ने दलित अधिकारों को लेकर बड़ा अंदोलन शुरू किया। पानी पीने के लिए कुंओं व तालाबों को दलितों समेत समस्त जातियों के लिए खोलना, मंदिरों-धार्मिक स्थलों में दलितों के प्रवेश के लिए संघर्ष करना। डाक्टर अंबेडकर ने उन धार्मिक ग्रंथों पर कड़ी टिप्पणियां कीं जो जाति व्यवस्था को उचित ठहराते हैं। नासिक के कालाराम मंदिर में प्रवेश के लिए आंदोलन आरंभ किया। हजारों की भीड़ को देखकर मंदिर के पुजारी ने मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए। गीता को जलाने का प्रतीकात्मक कार्य भी किया।
पेशवाओं के राज्य में तथा अन्य प्रदेशों में दलितों से होते अमानवीय व्यवहार का पर्दाफाश करने में डाक्टर अंबेडकर मनुवादी प्रवृतियों पर सीधा हमला करते हैं। वे ‘एनहीलेशन आफ कास्ट’ (जाति का खात्मा) पुस्तक में बताते हैं कि पेशवाओं के शासन में शूद्रों को गलियों में चलने पर भी मनाही थी ताकि हिंदुओं पर उनकी परछाई न पड़े तथा वे दूषित न हो जाएं। अछूत को अपने गले में या कलाई पर काला धागा बांधना पड़ता था ताकि भूल कर भी कोई हिंदू उनसे छू न जाए। पेशवा की राजधानी पूना में अछूत को अपने पीछे झाड़ू बांध कर चलना पड़ता था ताकि उनके पदचिन्ह साथ ही साथ मिटते जाएं व किसी हिंदू का पैर उस पर न रखा जाए। पूना में अछूत को अपने गले में छोटी मटकी लटका कर चलना पड़ता था ताकि वह धरती की जगह उसमें थूके तथा उच्च जाति वाले का पैर उसके थूक पर न पड़ जाए। ऐसी स्थितियों में ही आयनकली ने केरल में बैलगाड़ी पर चढ़ कर गश्त की तथा उच्च जातियों से हथियारबंद संघर्ष किया। डाक्टर अंबेडकर अपने लेखन में इस समस्त अमानवीय उत्पीडऩ का विरोध करते हैं। जब महात्मा गांधी अपनी मातृभूमि को प्यार करने का उपदेश देते थे तब डाक्टर अंबेडकर का उत्तर था, ‘‘गांधी जी, मेरा कोई होमलैंड नहीं। कोई भी आत्म सम्मान वाला अछूत इस धरती पर गर्व नहीं कर सकता।’’
हिंदुस्तान में जाति प्रथा को समझने के लिए डाक्टर अंबेडकर ने ‘‘अनटचेबल’’ (अछूत) नाम की पूरी किताब लिखी। अपने अन्य लेखन में भी वे स्पष्ट करते हैं कि, ‘‘जाति, कंट्रोल का दूसरा नाम है। जाति आपकी जिंदगी जीने पर बंदिशों लगाती है। अंतरजातीय खान-पान व अंतरजातीय विवाह का तिरस्कार करती है।’’ जिस हिंदू धर्म में जाति-पाति का कोढ़ है उसका समूचा विश्लेषण भी डाक्टर अंबेडकर ने कई जगह किया है। हिंदू धर्म अपने ग्रंथों को अनादि व अनंत मानता है इसलिए डाक्टर अंबेडकर के अनुसार इस धर्म में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं हो सकती। धार्मिक ग्रंथों को सर्वोपरि मानने वाले समस्त धर्मों पर डाक्टर अंबेडकर के यह विचार लागू होते हैं। उनके अनुसार एक हिंदू को अभिव्यक्ति की आजादी को त्यागना पड़ता है।
उसे वेदों के अनुसार व्यवहार करना पड़ता है। यदि व्यवहार को वेद मान्यता नहीं देते तो स्मृतियों के अनुसार इसकी परख की जाती है। यदि स्मृतियां भी कोई रास्ता नहीं दर्शातीं तो मानवीय व्यवहार को बड़े व्यक्तियों के कथनों की कसौटी पर परखना पड़ता है। मनुष्य से तर्क की आशा नहीं की जा सकती इसलिए जितना समय आप हिंदू धर्म में हैं आप सोचने की आजादी का सपना भी नहीं ले सकते। देखा जाए तो जाति प्रथा की दलदल व सोच की गुलामी ऐसे दो बड़े कारण थे जिनके कारण डाक्टर अंबेडकर अपने पांच लाख अनुगामियों के साथ बुद्ध धर्म ग्रहण कर लेते हैं। क्या कोई धर्म परिवर्तन मनुष्य समाज में गुणात्मक परिवर्तन ला सकता है? यह बहस का विषय है।
डाक्टर अंबेडकर के लेखन में अनेकों जगह ऐसे विचार हैं जिन्हें नारे तरह इस्तेमाल किया जाता है। यह विचार हैं भी बहुत महत्त्वपूर्ण जैसे कि : जो इतिहास को भूल जाते हैं वे इतिहास का सृजन नहीं कर सकते, मैं इस धर्म को पसंद करता हूं जो स्वतंत्रता, समानता व भाईचारे का संदेश देता है। यह नारा नवजागरण का था जिसे डाक्टर अंबेडकर धर्म पर लागू करते हैं। इसी तरह : जिंदगी लंबी होनी जरूरी नहीं महान होनी जरूरी है। मनुष्य के अस्तित्व का अंतिम निशाना बौद्धिकता, मन का विकास होना चाहिए ताकि हम अपने अधिकारों के लिए पूर्ण सामथ्र्य के अनुसार संघर्ष कर सकें। अपना संघर्ष जारी रखो तथा अपनी ताकत को संगठित करो। सत्ता व सम्मान तुम्हारे संघर्ष से ही तुम्हें मिलेगा। मनुष्य यदि अमर नहीं तो विचार भी अमर नहीं। विचारों को फैलाने की आवश्यकता पड़ती है वैसे ही जैसे पौधों को पानी की आवश्यकता पड़ती है। इनके बिना दोनों की मृत्यु को कोई नहीं रोक सकता। यह विचार धार्मिक सिद्धांतों के लिए भी उचित है तथा माक्र्सवादी विचारों के लिए भी। संघर्ष के साथ माक्र्सवादी सिद्धांतों पर अमल तथा उनका प्रचार-प्रसार भी बेहद जरूरी है। राजनीतिक उत्पीडऩ सहने से भी मुश्किल है सामाजिक उत्पीडऩ सहना। सामाजिक उत्पीडऩ सहने वाले अधिक बहादुर व हौसले वाले होते हैं। हर धर्म के धर्मग्रंथों की श्रेष्ठता को समाप्त करना जरूरी है। स्त्री पुरुष का रिश्ता दोस्तों जैसा होना चाहिए।
डाक्टर अंबेडकर भक्ति व व्यक्ति/नायक पूजा को एक समान समझते हुए राजनीति में इसका विरोध करते हैं। उनके अनुसार धर्म में भक्ति शायद आत्मा को मुक्ति देती हो परंतु राजनीति में नायक पूजा डिक्टेटरशिप की ओर जाता रास्ता है। इसीलिए वे तर्कवादी होने के कारण अपने आपको मूर्ति भंजक कहते हैं। महात्मा गांधी से डाक्टर अंबेडकर के संवाद को भी इसी दृष्टि से देखना बनता है। वे महात्मा गांधी के विचारों के पीछे उनके मंतव्य का, विशेष रूप में दलितों को अधीन रखने की मानसिकता को पूरी दृढ़ता से उघाड़ते हैं। महात्मा गांधी के मरण व्रत के समक्ष झुककर डाक्टर अंबेडकर को समझौता भी करना पड़ता है। पर वे बौद्धिकता की स्वतंत्रता को तर्क को नहीं त्यागते।
डाक्टर अंबेडकर के अनुसार बौद्धिक आजादी ही वास्तविक आजादी है। व्यक्ति जो जंजीरों में जकड़ा न भी हो यदि उसका मन आजाद नहीं है तो वह गुलाम है आजाद नहीं। व्यक्ति जेल की सलाखों के पीछे न भी हो पर यदि उसका मन आजाद नहीं तो उसे आजाद नहीं कहा जा सकता। जिस व्यक्ति का मन आजाद नहीं चाहे वह जी भी रहा हो वह मृतकों के समान है। मन की स्वतंत्रता मानवीय अस्तित्व का प्रमाण है। डाक्टर अंबेडकर ने एक और प्रश्न उठाया है कि आजादी की आवश्यकता क्यों है ? उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि सामाजिक व्यवस्था को सुधारने के लिए हमें इसकी अति आवश्यकता है क्योंकि इसमें असमानताओं के अंबार हैं, भेदभाव जगह-जगह होते हैं तथा यह असमानताएं व भेदभाव हमारे मूल अधिकारों से टकराते हैं।
धर्म व ईश्वर के बारे में डाक्टर अंबेडकर के विचार बुद्ध धर्म से प्रभावित हैं तथा माक्र्सवाद के पदार्थवादी दृष्टिकोण के नजदीक हैं। उनके अनुसार हर धर्म कीमती व पूजने योग्य नहीं होता। धर्म को जिंदगी के तथ्यों के अनुरूप होना चाहिए न कि ईश्वर व आत्मा, स्वर्ग के सिद्धांत या कल्पना के अनुरूप होना चाहिए। धर्म को ईश्वर केंद्रित बनाना अनुचित रुझान है। इस तरह मुक्ति व आत्मा को केंद्र में लाना ही अनुचित है। पशु बलि को धर्म के केंद्र में नहीं आना चाहिए। वास्तविक धर्म मनुष्य के दिल में होता है। शास्त्रों में नहीं। धर्म के केंद्र में मनुष्य व सदाचार रहने चाहिएं। यदि ऐसा नहीं होता तो धर्म उत्पीडक़ अंधविश्वास है। धर्म का कार्य दुनिया का निर्माण करना है तथा इसे खुशहाल बनाना है न कि इसके आदि अंत की व्याख्या करना। हितों के द्वंद के कारण दुनियां में दुख/नाखुशियां हैं इन द्वंदों को बुद्ध धर्म के आष्टांग मार्ग पर चल कर ही दूर किया जा सकता है। निजी संपत्ति किसी एक वर्ग को शक्तिशाली बनाती है जो दूसरे वर्ग के लिए दुख लेकर आती है। धर्म के बारे में विचार ‘‘बुद्ध या कार्ल माक्र्स’’ पुस्तक में प्रकट किए गए हैं जिनमें से कई माक्र्सवादी विचारों के बड़े नजदीक हैं। इनका गहरा अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है। डाक्टर अंबेडकर दलितों के प्रति ईश्वर को मानने के भयंकर परिणाम निकलते देखते हैं। पीढिय़ों की पीढिय़ों में ईश्वर की चौखट पर माथा रगड़ रगड़ कर अपने आपके तबाह किया है परंतु ईश्वर ने उन पर कभी दया नहीं की। पीढिय़ां दर पीढिय़ां गांवों में मैला साफ किया परंतु ईश्वर ने क्या किया? मृत पशु खाने के लिए दिए। ईश्वर ने कोई दया नहीं की। क्या तुम इस ईश्वर की पूजा नहीं करते? यह दलितों की सरासर अज्ञानता है। वास्तव में समाज ने व मनुवाद ने शूद्रों को उनके अधिकारों से वंचित करने के लिए पूरा जाल बिछाया हुआ है। यह अधिकार कभी भी ईश्वर के समक्ष चिरौरी करके या उत्पीडक़ को उनकी अंर्तात्मा की दुहाई देकर प्राप्त नहीं किए जा सकते। इसके लिए संघर्ष व सिर्फ संघर्ष ही एकमात्र रास्ता है। आवश्यकता शेर बनने की है। बलि बकरे की दी जाती है शेर की नहीं।
डाक्टर अंबेडकर जब मन व शरीर के रिश्तों की व्याख्या करते हैं तो द्वंदात्मक पदार्थवादी दीखते हैं। उनका प्रश्न है मनुष्य का शरीर बीमार क्यों होता है? कारण? जब तक मानव शरीर दुखों/बिमारियों से मुक्ति नहीं पाता तब तक मन खुश हो ही नहीं सकता। यदि मनुष्य में उत्साह ही नहीं तो समझो उसका शरीर या मन बीमार है। मनुष्य में उत्साह कहां से आता है? उत्साह नहीं होगा तो जिंदगी नर्क बन जाएगी केवल बोझा, जिसे ढोना पड़ रहा है। उत्साह के बिना कोई उपलब्धि नहीं की जा सकती। मनुष्य में उत्साह की कमी होने का कारण है कि उसे किसी अवसर की प्राप्ति व ऊपर उठने की कोई आशा नहीं दिखती। बिना आशा के होना उत्साह को मार देता है। मन ऐसी स्थिति में बीमार हो जाता है। उत्साह कब आता है? जब मनुष्य ऐसे स्वस्थ वातावरण में सांस लेता है कि उसे अपने किए कार्य का उचित मुआवजा/इनाम मिलना सुनिश्चित हो। सिर्फ इसी स्थिति में ही मनुष्य में उत्साह व प्रेरणा की अमीरी आती है। वर्तमान बिना आशा भरे वातावरण को समझने के लिए डाक्टर अंबेडकर के यह विचार अति महत्त्वपूर्ण हैं।
आज जबकि भारतीय संविधान से छेड़छाड़ करने के प्रयत्न किए जा रहे हैं तब 26 जनवरी 1950 को दिए गए डाक्टर अंबेडकर के भाषण के कुछ अंशों पर नजर मार लेना आवश्यक हो जाता है। उन्होंने राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक जीवन के द्वंदों को केंद्र में रखते हुए कहा था कि राजनीतिक स्तर पर संविधान के अनुसार हम समान हैं जबकि सामाजिक व आर्थिक स्तर पर असमानता ज्यों की त्यों है। राजनीति में हमने एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत को स्वीकार किया है अर्थात एक वोट की एक कीमत परंतु सामाजिक व आर्थिक जीवन में सामाजिक ढांचे के अनुसार एक व्यक्ति की एक समान कीमत से हम इंकारी हैं। यह अंर्त-द्वंद कब तक रहेंगे? सामाजिक व आर्थिक जीवन में समानता से कब तक इंकार करेंगे? यदि हम इस द्वंद को जारी रखते हैं तो हम अपने जनवाद को तबाह कर लेंगे। इस अंर्त-द्वंद को जितनी जल्दी हल कर लेंगे उतना ही उचित रहेगा नहीं जो असमानता झेल रहे हैं वह राजनीतिक संरचना को उड़ा देगी, जिसे संसद ने काफी परिश्रम से निर्मित किया है। अंबेडकर के इन विचारों को आगे बढ़ाएं तो यह अंर्तद्वंद हल नहीं हुए बल्कि बढ़ रही आर्थिक असमानता के मद्देनजर पूर्ण रूप से अमीर पक्षीय हो जाने से संविधान के समक्ष नए खतरे खड़े हो गए हैं, जिनमें से अंधराष्ट्रवाद अपना रंग दिखा रहा है।
डाक्टर अंबेडकर के लेखन की 40 से अधिक जिल्दें उपलब्ध हैं। उन सभी का मुल्यांकन करना बहुत बड़ा कार्य है। हम यहां उनके कुछ विचारों को केंद्र में रखकर जन्म दिवस पर उन्हें स्मरण कर रहे हैं। उनकी यह उक्ति अक्सर उद्धृत की जाती है कि- ‘‘पढ़ो, संगठित हो तथा संघर्ष करो।’’ पहले इसके अर्थ दलितों को ही संबोधित थे, पर अब संकट इतना गंभीर है कि इस कथन को विस्तारित करके वामपंथी पक्षों व दलित पक्षों की एकता से भी आगे बढ़ते हुए अल्प संख्यकों व अनुसूचित जन-जतियों; पिछड़े वर्गों तक इसका विस्तार करने की आवश्यकता है। वामपंथी व दलित चिंतक भी इस पर बल दे रहे हैं। जहां आर.एम.पी.आई. ने अपने संविधान में ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने की प्रतिक्षा की है जिसमें दलित व नारी समानता सुनिश्चित हो वहीं दलित आंदोलन के संस्थापकों ने भी दलित व वाम एकता पर बल दिया है। शरण कुमार लिंबाले गोपाल प्रधान को दिए गए साक्षात्कार में स्पष्ट करते हैं कि-‘‘उत्पीडि़त लोगों के आर्थिक प्रश्नों को ही लेकर आगे बढ़ा जा सकता है। आर्थिक लूट को छोड़ कर केवल सामाजिक प्रश्नों को प्राथमिकता देने के कारण आंदोलन के विकास में बाधा उत्पन्न हो गई है। ऐसी स्थिति में कम्युनिस्टों से सहयोग करना अति आवश्यक हो गया है। मेरा तो मानना है कि हर शोषित व्यक्ति को अंबेडकर पढऩा चाहिए तथा हर दलित को माक्र्स पढऩा चाहिए। इस तरह मिल कर यह लड़ाई आगे बढ़ सकती है।’’ अब आवश्यकता है इन विचारों को वास्तविक रूप देने की।

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