शिव अमरोही
भारत में सन् 1990 से उदारीकरण, निजीकरण व संसारीकरण की नीतियों के लागू होने के कारण भारत सरकार तथा राज्य सरकारों ने लोक कल्याणकारी राज्य के संकल्प को पूरी तरह त्याग दिया तथा धीरे-धीरे देसी व विदेशी बड़ी-बड़ी कंपनियों ने यहां अपना जाल बिछा लिया। जिस कारण लोक कल्याण के स्थान पर इन कंपनियों ने (जिसे आजकल कारपोरेट सैक्टर के नाम से जाना जाता है) लूट, लोभ, लालच और शोषण का जोरदार चक्कर चलाया हुआ है। सरकारें वास्तव में इनके ऐजंट के रूप में काम कर रही हैं। इसीलिए सार्वजनिक सैक्टर को समाप्त करने के लिए प्रत्येक संभव प्रयत्न किया जा रहा है। पंजाब में उपरोक्त प्रयत्नों के चलते सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्र के विभाग जैसे स्वास्थ्य, सार्वजनिक, ट्रांसपोर्ट, बिजली, सडक़ तथा स्कूली शिक्षा केवल नाम के लिए ही रह गई हैं। यहां स्कूली शिक्षा के संबंध में ही विचार करेंगे क्योंकि पंजाब में प्राइमरी तथा सैकंडरी स्कूल शिक्षकों का संघर्ष आजकल चरम शिखर पर है।
पंजाब सरकार ने स्कूली शिक्षा को समाप्त करने के लिए सबसे पहले स्कूलों में विशेषतया प्राइमरी स्कूलों में अध्यापकों के पदों को भरना बंद कर दिया। यह बीसवीं सदी के अंतिम दशक की बात है। स्कूल, अध्यापकविहीन हो गए तो प्राइवेट स्कूल धड़ाधड़ खुल गए। सरकारी स्कूलों का स्तर गिरने से समाज में इनकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न लगने शुरु हो गए।
इसके विरुद्ध अध्यापक संगठनों ने तथा बेरोजगार अध्यापकों ने जोरदार संघर्ष किया जिसके परिणामस्वरूप सरकार अध्यापकों की नई भर्ती करने पर बाध्य हुई। सरकार ने इसमें एक नई चाल चली। अध्यापकों की नई भर्तियां अलग-अलग शर्तों, नियमों, अलग-अलग वेतनमानों तथा भिन्न-भिन्न नामों के अंतर्गत की गई। इनमें से अधिकतर भर्तियां बहुत ही कम तथा एकमुश्त वेतन पर की गई थी। उल्टा चक्कर चलाते हुए कुछ स्कूल जिला परिषद तथा लोकल बॉडीका के अधीन कर दिए। केन्द्रीय प्रयोजित योजना के अंर्तगत/एस.एस.ए / र म सा (स्स््र/क्ररूस््र) ए. आई.ई.वी. (्रद्यह्लद्गह्म्ठ्ठड्डह्लद्ब1द्ग द्बठ्ठठ्ठश1ड्डह्लद्ब1द्ग श्वस्रह्वष्ड्डह्लद्बशठ्ठ ङ्कशद्यह्वठ्ठह्लद्गद्गह्म्) आई.ई.वी. (ढ्ढठ्ठष्द्यह्वह्यद्ब1द्ग श्वस्रह्वष्ड्डह्लद्बशठ्ठ ङ्कशद्यह्वठ्ठह्लद्गद्गह्म्), आई.ई.आर.टी. (ढ्ढश्वक्रञ्ज-ढ्ढठ्ठष्द्यह्वह्यद्ब1द्ग श्वस्रह्वष्ड्डह्लद्बशठ्ठ क्रद्गह्यशह्वह्म्ष्द्ग ञ्जद्गड्डष्द्धद्गह्म्) ई.जी.एस.टीचर (श्वस्रह्वष्ड्डह्लद्बशठ्ठ त्रह्वड्डह्म्ठ्ठह्लद्गद्ग स्ष्द्धद्गद्वद्ग ञ्जद्गड्डष्द्धद्गह्म्) एस.टी.आर. (स्श्चद्गष्द्बड्डद्य ञ्जह्म्ड्डद्बठ्ठद्गह्म् क्रद्गह्यशह्वह्म्ष्द्ग क्कद्गह्म्ह्यशठ्ठ) शिक्षा कर्मी आदि दर्जन भर नामों के अधीन शिक्षक भर्ती किए। इनका न केवल वेतन तथा अन्य नियम भिन्न-भिन्न थे बल्कि सेवा की भी कोई गारंटी नहीं थी। इनमें केवल एक ही बात सांझी थी कि इनका वेतन अलग-अलग होते हुए भी एकमुश्त था। वास्तव में सरकार अध्यापकों की एकता नहीं चाहती थी और इसमें वह सफल भी रही। उपरोक्त नियुक्तियों के कारण अलग-अलग अध्यापकों के अलग-अलग संगठन बन गए जिससे अध्यापक वर्ग का दबाव कम हो गया। ऐसे में सरकार ने सभी नवनियुक्त अध्यापकों के लिए प्रथम तीन वर्षों के लिए एकमुश्त दस हजार तीन सौ रु. वेतन की प्रणाली लागू कर दी। सरकारी स्कूल जो मध्यम वर्ग में अपनी प्रासंगिकता पहले ही खो चुके थे उनकी जड़े और खोखली करने के लिए प्राइमरी स्कूलों में प्रति अध्यापक प्रति श्रेणी छात्रों की संख्या बढ़ा कर तथा सैकंडरी स्कूलों में प्रति अध्यापक घंटियों (क्कद्गह्म्द्बशस्रह्य) की संख्या बढ़ाकर भारी संख्या में अध्यापकों के पद समाप्त कर दिए। बिना अध्यापकों की व्यवस्था किए ‘पढ़ो पंजाब-पढ़ाओ पंजाब’ कार्यक्रम शुरु कर दिया-अर्थात दो अध्यापकों का काम एक अध्यापक के सिर पर मढ़ दिया गया। छात्रों की कम संख्या का बहाना बनाकर सैंकड़ों प्राथमिक स्कूल बंद कर दिए। कर्मचारियों द्वारा अपने संघर्षों के बल पर अकाली-भाजपा सरकार को अपने शासनकाल के अंतिम महीनों में तदर्थ कर्मचारियों को रैगुलर करने पर मजबूर किया गया था जिसके परिणामस्वरूप तत्कालीन विधान सभा में पास होकर आया कानून नई आई कांग्रेस सरकार ने लागू करने से इंकार कर दिया। उपरोक्त अनेक कारणों से अध्यापकों के अंदर आक्रोश की ज्वाला धधक रही थी। सरकार द्वारा अपने चहेतों की असमय असंख्य बदलियां तथा 800 प्राथमिक स्कूलों को बंद करने के निर्णय के विरुद्ध अध्यापक संघर्ष के मैदान में डट गए। अध्यापकों के 26 संगठनों ने ‘अध्यापक सांझा मोर्चा’ बना कर पहले लुधियाना शहर में पिछले तीन वर्षों का सबसे विशाल प्रदर्शन करके तथा उसके कुछ समय पश्चात मुख्यमंत्री के शहर पटियाला में उससे भी प्रदर्शन करके अपनी एकता को दर्शाते हुए सरकार के सामने चुनौती पेश की। लेकिन सत्ता के नशे में चूर सरकार ने जो सभी अध्यापकों को पूर्ण ग्रेड देने के वायदे के साथ सत्ता में आई थी इस आंदोलन को नकारअंदाज कर दिया तथा न केवल अध्यापकों से बातचीत करने से इंकार किया बल्कि अध्यापकों के एक वर्ग (एस.एस.ए./र.म.सा.) जो पिछले दस से बारह वर्षों से सेवा निभा रहे थे तथा अपने संघर्षों के बलबूते 48000/- से भी अधिक वेतन प्रतिमास ले रहे थे उन्हें नियमित/रैगुलर करने के लिए तीन वर्षों तक 15000/- प्रतिमास एकमुश्त वेतन कर काम करने का आदेश जारी कर दिया। अध्यापकों का एक और वर्ग जो भर्ती की संख्या के आधार पर ही 5178 के नाम से प्रसिद्ध हो चुका था तथा जिनकी भर्ती पेंडू सहयोगी (ग्रामीण सहायक) अध्यापकों के रूप में 6000/- मासिक एकमुश्त पर की गई थी, को तीन वर्ष की अवधि समाप्त हो जाने पर नियमित नहीं किया गया था, जिससे सभी तदर्थ/एकमुश्त वेतन पर काम करने वाले आशंकित थे कि सरकार तीन वर्ष बीतने पर भी उन्हें नियमित करने से पीछे हट सकती है।
पंजाब के इतिहास में अध्यापकों तथा स्कूल शिक्षा प्रणाली पर ऐसा हमला शायद पहली बार हुआ था। इसकी प्रतिक्रिया भी तुरन्त सामने आई। पहले 11 और फिर 14 अध्यापक पटियाला में आमरण अनशन पर बैठ गए जो बाद में 24 घंटे-24 घंटे की भूख हड़ताल में बदल गया और यह पक्का मोर्चा 56 दिन चला। प्रतिदिन अलग-अलग जिलों से हजारों की संख्या में अध्यापक पक्के मोर्चे में शामिल होते रहे। उधर शिक्षा मंत्री ने अध्यापकों के विरुद्ध अ$खबारों तथा मीडिया में जोरदार दुष्प्रचार आरम्भ किया। शिक्षा सचिव तथा अन्य शिक्षा अधिकारियों ने एस.एस.ए./र.म.सा. अध्यापकों को 15000/- प्रति मास वेतन पर रैगुलर होने की आप्शन (शश्चह्लद्बशठ्ठ) क्लिक करवाने के लिए इतने झूठ, दबाव, लालच तथा दमनकारी हथकंडे अपनाए कि हिटलर का मंत्री गोयबल्स भी लज्जित हो जाए। अनेक अध्यापक नेताओं को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया, अनेक नेताओं को निलंबित किया गया। सैंकड़ों अध्यापक नेताओं को दूर-दराज के स्कूलों में भेजा गया। अध्यापकों के अवकाश लेने पर प्रतिबंध लगा दिए गए। जिला केडर के अध्यापक जिन्हें नियमानुसार जिले के बाहर नहीं भेजा जा सकता उन्हें पांच-पांच, छ: छ: जिले लांघ कर दूर के स्कूलों में भेजा गया। आप्शन पर क्लिक करने वाले अध्यापकों को लालच दिया गया कि वे अपने घर के निकट के किसी भी स्कूल में हाजिर हो सकते हैं तथा क्लिक न करने वाले अध्यापक को वहां से हटा (ष्ठद्बह्यद्यशष्ड्डह्लद्ग) कर सकते हैं। अध्यापक मोर्चे के नेताओं ने शिक्षा मंत्री से कई बार मुलाकात की, मुख्यमंत्री से मीटिंग के अनेक बार आश्वासन मिले लेकिन यह सब धोखे के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। जनता में अध्यापकों के प्रति सहानुभूति थी लेकिन मुख्यमंत्री, मंत्री व नौकरशाही अध्यापकों पर मढ़ी गई घटिया निंदनीय, असंवेदनशील गैरबाजिव तथा क्रूर धाराओं व नीतियों को अध्यापकों की बाजू मरोड़ कर हर हालत में लागू करने पर आमादा थे। सांझे अध्यापक मोर्चे की पीठ पर कर्मचारी, किसान, मजदूर आदि संगठन भी आ गए तथा दो दिसम्बर 2018 को पटियाला में भारी संख्या में पहुँच कर तब तक धरना प्रदर्शन करने की घोषणा की गई जब तक अध्यापकों की मांगों पर गौर नहीं किया जाता। इस प्रदर्शन की तैयारियों से घबराए शिक्षा मंत्री ने पहली दिसम्बर को पक्के मोर्चे में आकर अध्यापकों पर बदले की नीति के अंतर्गत की गई सभी कार्यवाही वापस लेने तथा अध्यापकों के वेतन पर विचार हित मुख्यमंत्री से मीटिंग का आश्वासन दिलाकर पक्का मोर्चा समाप्त करवा दिया। लेकिन अपनी ही घोषणाओं से मंत्री जी न केवल पीछे हट गए बल्कि पांच और अध्यापक नेताओं की सेवाएँ भी बर्खास्त कर दीं। सरकार का यह कहर देखकर अध्यापकों के 12 और संगठन भी संघर्ष में कूद पड़े तथा इस प्रकार अध्यापक संघर्ष कमेटी अस्तित्व में आ गई। इस कमेटी ने शिक्षामंत्री के शहर अमृतसर को घेरने का ऐलान कर दिया। इस ऐलान के बाद हुई बातचीत में अध्यापकों पर किए गए दमनकारी पग कुछ सीमा पर वापिस ले लिए गए लेकिन वेतन सम्बन्धी तथा तदर्थ अध्यापकों को नियमित करने सम्बन्धी मुख्यमंत्री से की जाने वाली वार्ता से वह पीछे हट गए। परिणामस्वरूप अध्यापक संघर्ष कमेटी ने दस फरवरी के दिन पटियाला में विशाल रैली शुरु कर दी। जब कोई भी उनकी बात पूछने वहां न आया तो अध्यापकों ने मुख्यमंत्री के आवास मोती महल की ओर कूच कर दिया। ऐसा अनुमान है कि बीस हजार के लगभग महिला व पुरुष अध्यापक इस रोष मार्च में शामिल थे। पुलिस ने भयानक सर्दी के इस मौसम में अध्यापकों पर न केवल ठंडे पानी की बौछारें ही कीं बल्कि लाठीचार्ज भी किया। इसमें अनेक अध्यापक घायल हो गए। देर रात तक अध्यापक वहीं डटे रहे। मुख्यमंत्री को भी ब्यान जारी करना पड़ा तथा 28 फरवरी का दिन बातचीत के लिए नियत किया गया। 14 फरवरी को शिक्षामंत्री ने कुछ और मांगों पर सहमति दी है। मुख्य मांग अध्यापकों को उनके वेतन को क्कह्म्शह्लद्गष्ह्ल (सुरक्षित) करके उन्हें नियमित करने की अभी भी बाकी है। स्कूलों व स्वास्थ्य संस्थाओं को हृ.त्र.ह्रज्ह्य (गैर सरकारी संस्थाओं) के हवाले करने की घोषणा वापिस करवाना, प्रोबेशन पीरियड तीन साल से कम करके एक साल करना, तदर्थ अध्यापकों को अकाली-भाजपा सरकार द्वारा जारी नोटिफिकेशन के अनुसार रैगुलर करना, तीन वर्ष का प्रोवेशन पीरियड पूरा कर चुके अध्यापकों को उपरोक्त पीरियड समाप्त होने के दिन से रैगुलर करना, स्कूलों को बंद न करना तथा बंद किए गए स्कूलों को फिर से चालू करना ट्रांसफर नीति को शिक्षा की बेहतरी के लिए संघर्ष कमेटी के सुझावों के अनुसार बनाना, ‘पढ़ो पंजाब’ के स्थान पर सामान्य पाठ्यक्रम लागू करना, वेतन आयोग की रिपोर्ट व मंहगाई भत्ता जारी करना आदि अध्यापक मांगें न केवल न्यायोचित तथा गरीब जनता की शिक्षा से जुड़ी हुई हैं बल्कि इसी से गरीब जनता के लिए सार्वजनिक शिक्षा को बचाया जा सकता है। लेकिन पंजाब सरकार तो बड़ी-बड़ी कम्पनियों के लिए शिक्षा को सुरक्षित करना चाहती है, इसीलिए अध्यापक संघर्ष उसे फूटी आंखों नहीं सुहाता। ताकत के नशे में चूर पंजाब सरकार इस संघर्ष पर क्रूर दमन चक्र चला रही है। लेकिन पंजाब सरकार क्या चाहती है, क्यों चाहती है और किसकी सेवा करना चाहती है इसे जनता समझने लगी है तथा इसके विरुद्ध संगठित भी होने लगी है।