sangrami lehar

ਸਾਹਿਤ ਤੇ ਸੱਭਿਆਚਾਰ (ਸੰਗਰਾਮੀ ਲਹਿਰ-ਮਈ 2018)

  • 07/05/2018
  • 08:21 PM

हिंदी कहानी
दिवाली का दिन
- सुस्मित सौरभ

सुबह-सुबह मुनिया को माई आंगन लीप रही थी। गीले गोबर को फैलाने की सड़-सड़ की आवाज पूरे आंगन में भर उठती थी। गोबर और मिट्टी की मिली-जुली गंध ने मुनिया की देह में उमंग भर रखा था और वो रह-रह कर गुनगुना उठती-दीप जलाओ, दीप जलाओ, आज दीवाली रे...। आँगन-दुआर चक चक करता है, तब तो लक्ष्मी माई घर में आवत हैं। आदमी धन से गरीब होत है, तन-मन से थोड़े ही। सूरज चढऩे तक घर का सारा काम निपटा लूं। दक्खिन टोला के पंडिताइन ने बुलावा भेजा है, आँगन लीपने के खातिर। तीज त्योहार का दिन है... दो चार रुपए मजूरी में मिल जाएँ तो दीया-बाती का इंतजाम हो। बड़ी कंजूस है पंडिताइन साल भर माटी के मटके-बरतन, दीये-चुक्के घर पहुंचाओ और कटनी के समय दो सेर अनाज देने में आँख उलट जाती है पंडिताइन की...। आज मुनिया के बापू को बाजार भी तो भेजना है दीये-चुक्के बेचने। उसी से कुछ पैसे आ पाएंगे।
सोचती हुई मुनिया की माई बेटी का गीत सुनकर तनिक मुस्काई। बचकानी आवाज में गीत मधुर लग रहा था उसे। मुनिया की जबान पर ई गीत भोरे से चढ़ा हुआ है। मुनिया ने गनेशी के बेटा मंगल से सीखा है यह गीत। मंगल कहता है कि उसके स्कूल की मेम जी सुंदर-सुंदर गीत सिखाती हैं। वो गांव के पास वाले मिशन स्कूल में पढ़ता है। माथे में सरसों का तेल डालकर किनारे से मांग काढ़ता है, मंगल। मंगल पीठ पर बस्ता टांगकर जब टप्प-टप्प जूता बजाते स्कूल जाता है तो मुनिया का मन भी ललक उठता है। माई कहती है कि मुनिया अभी छोटी है। अगले बरिस उसका नाम लिखवा देगी मंगल के ईस्कोल में। माई की बात सुनकर मुनिया खुश हो जाती है। वो भी माथे में तेल डालकर दो चोटी बनाएगी लाल फीते वाली।
गनेशी रिश्ते में मुनिया के बापू महेश का गोतिया-भाई लगता है। कलकत्ता के कारखाने में काम करता है गनेशी। उसकी बहुरिया और मंगल यहीं गांव में रहते हैं। उसने अपनी कमाई से एक पक्का मकान बनवा लिया है जिसमें एक संडास भी है। गनेशी छुट्टी में जब भी घर आता है तो मंगल के लिए सुंदर-सुंदर कपड़े और खिलौने लाता है। एक बार गनेशी ने महेश से कहा था।
'भइया, कलकत्ता चल चलो। वहां कुछ न कुछ जुगाड़ तो हो ही जाएगा काम का। नकद कमाई होगी। यहां गाव में क्या मिलता है? सालभर हाड़-तोड़ कर काम करो और जो धान मिलता है वो एक बेर भात खाकर सालभर भी नहीं चलता। चाक-चकरी के दिन रहे नहीं। अब तो मशीनों से ऐसे-ऐसे बरतन-भांडे बनते हैं कि देखकर आँखे निकल जाएँ।Ó
लेकिन महेश नहीं माना। उसे गांव छोड़कर नहीं जाना। भगवान ने जनम दिया है तो जीने खाने का इंतजाम भी वो ही करेंगे।
मुनिया दो दिन से माई के पीछे पीछे घूम रही थी। वह हांडी में रखा चुना उठा लाई। माई...माई... मेरा घेरौंदा तो रंग दे। रधिया की माई ने कितना सुंदर घेरौंदा बनाया है, उसमें आदमी बैठाया है और एक फटफटिया भी खड़ा कर दिया है। रधिया कहती है कि उसके बापू बाजार से कुल्हिया-चुकिया लाएँगे और  चीनी वाला घोड़ा-हाथी भी। उसके छोटका भाई को खूब रुचती है हाथी-घोड़ा वाला चिनिया मिठाई।Ó
मुनिया की माई कुछ कह न सकी। उसने मुनिया के हाथ से हांड़ी ले ली और चुपचाप घेरौंदा बनवाती है। जी तो नहीं करता मुनिया की माई का घेरौन्दा रंगने लगी। मुनिया हर साल घेरौंदा बनाने का पर बेटी का मुँह देखकर सब कुछ भूल जाती है वो।
'कैसे बताए अपनी छोटी-सी जान को कि उसके ऊपर के दो-दो भाई जन्म से साल भर के भीतर ही धरती में दफन हो गए। मुनिया के जनम के बाद दूसरी कोई औलाद नहीं हुई मुनिया के माई की। अब तो बस एक मुनिया ही है उसके आँख की लकड़ी।Ó
आज दीवाली है। गेहूँ की कटनी की मजूरी में जो गेहूँ मिला था, उसमें से थोड़ा बचाकर रख लिया मुनिया की माई ने। उसी को चक्की से पिसवा लाई थी। बाकी गेहूँ अधिया-तीसरी के भाव नून-तेल में खरच हो गया। आज वो तेल की पूरी बनाएगी मुनिया के लिए। ऐसे तो बेचारी को नून-भात खाकर ही गुजारा करना पड़ता है। कलेजा दो टूक हो जाता है। मुनिया की माई का, फूल सी बेटी को बासी भात खिलाने में। दोनों हाथ जोड़ कर आसमान की ओर देखती है मुनिया की माई।
'हे लछमी मईया, बेटी के लिए फेरो।Ó
महेश कुम्हार सुबह से दीए, गणेश-लक्ष्मी जी की मूर्तियां, चुक्के, डोल, खिलौने रंगने में व्यस्त है। हाथ जल्दी-जल्दी चलेंगे, तभी तो दूसरे पहर तक बाजार जा पाएगा। उसकी पांच बरस की बेटी मुनिया कभी उसे खिलौने रंगने के लिये रंग लाकर देती तो कभी रंगे हुए डोल, चुक्के,दीए, मूर्तियां बांस की टोकरी में सजाकर रखती। पूरे घर में चौकड़ी भरती घूम रही है मुनिया।
'मंगल के बापू कलकत्ते से एक बंदूक लाए हैं। उसमें से आग और धुआँ दोनों निकलता है। मंगल मुझे बंदूक से खेलने नहीं देता, बापू। क्या आप मेरे लिए वैसी बंदूक खरीद दोगे?Ó
महेश काम में व्यस्त था। उसने धीरे से सिर हिला दिया। मुनिया को अपना जवाब नहीं मिला तो उसने वही बात दोहराई। महेश झल्ला उठा-
'घर में चार आने नहीं हैं। कहां से लाऊं मैं तेरे लिए बंदूक?Ó
मुनिया सहम गई। उसे पिता से ऐसे उत्तर की आशा नहीं थी, सो ठुनकती हुई अपनी माई के साड़ी के पल्लू में छुप गई। माई के पल्लू में छुपकर उसे लगता कि दुनिया में किसी का भय नहीं उसे, बापू का भी नहीं। माई के शरीर की गर्मी उसे नींद के झोंकों में ले जाती और वो सपने में खो जाती। मिठाइयों का पेड़, सुंदर कपड़ों से भरा एक बड़ा सा घर, छोटी छोटी चूडियां, बिंदी, जूते...।
मुनिया की माई को महेश का यह बर्ताव तनिक भी नहीं सुहाया पर चुप ही रही।
'लोग अंकवारी में बाँध कर घूमत हैं अपनी औलाद को और इ आदमी, हमेशा खांव-खांव किए रहत है। कवनो कोठा-अंटारी मांगा है बेटी ने? बाप बच्चों की खुशी के खातिर का नहीं करत है? अरे, गनेशी भईया को ही देख लो, अपने बाल-बच्चन के खातिर कौन-सा-इंतजाम नहीं किया है उसने? तब तो गनेशी की बहुरिया एड़ी अलगाकर चलत है। 'माई... ओ माई, बापू ये सामान और खिलौने बेचने बाजार कब जाएँगे? मैं भी जाऊंगी उनके साथ। वहां बहुत सारे लोग आँएंगे। वे हमारे खिलौने खरीदेंगे, हमें पैसे देंगे। फिर... फिर उन पैसों से बापू मेरे लिए पटाखे खरीदेंगे, मिठाई खरीदेंगे और मैं आपके साथ घर में दीवाली मनाऊंगी।Ó शायद ये बातें उसकी माई ने उसका मन रखने के लिए कही होगी कभी!
आज मुनिया ने माई से बालों में दो चोटी बनवाई है। माई ने उसे फूल के छापे वाला फ्राक भी पहना दिया था। मुनिया को बहुत पसंद है ये फ्राक। पिछले बरस मौसी के ब्याह में नानी ने खरीद दिया था इसे मुनिया के लिए। सावन में मंगल को मुनिया ने राखी बांधी थी और मंगल की मां ने उसे पूरे एक रूपया दिया था राखी की बंधाई में। वह इसी पैसे को लेकर बाजार जाएगी। उससे फुलझड़ी खरीदेगी, मिठाई खरीदेगी। मंगल को एक भी फुलझड़़ी नहीं देगी मुनिया क्योंकि मंगल उसे बंदूक नहीं देता।
दोपहर में कुछ रूखा-सूखा खाकर जब महेश ने अपनी खिलौने और बाकी सामानों से भरी टोकरी उठायी तो मुनिया भी मचल उठी उसके साथ जाने के लिए। बच्चे की जिद को ठुकरा न सका महेश और मुुनिया को साथ लेकर बाजार की तरफ चल पड़ा। चलते समय मुनिया की माई ने कुछ सोचते हुए एक रूपये का सिक्का मुनिया के हाथ में थमा दिया।
'बच्चे का मन बड़ा लालची होत है। बेचारी कितने आसरे से बाजार जा रही है, जाने कब तक लौटेगी? पैसा रहेगा तो कुछ खरीद लेगी। नहीं तो न जाने अपने मन को कितना जलाएगी। भगवान, गरीब को पेट न दें।Ó
गांव से आधे कोस की दूरी पर गजराजगंज बाजार है। मुुनिया के पैरों में तो जैसे पंख उग आए थे। दौड़ती जा रही थी मुनिया ठाकुरबारी से एक पगडंडी चलती थी पईन के किनारे किनारे। पहले गोधन बाबा की चिमनी, फिर भूतहवा पीपल, कुछ गाएं, कुछ बकरियां और बस पड़ाव वाले पुल को पार करते ही बाजार। रास्ते में कई लोग मिले जो बाजार जा रहे थे। मंगल भी। आज बाजार में खूब चहल पहल थी। दूसरे गांवों सें भी लोग आए थे। सभी खुश नजर आ रहे थे। नन्हक साह की दुकान की बगल में मुनिया और महेश ने एक छोटी सी जगह पर अपनी टोकरी रख दी। मुनिया ने बापू का अंगोछा बिछाकर कुछ मूर्तियां और सामान सजा दिए और खरीददार के आने की प्रतीक्षा करने लगी।
मिठाई की दुकानों पर तो खूब भीड़ थी। शोर मच रहा था उन दुकानों पर। सब पहले मुझे, पहले मुझे की जल्दी मचाए पड़े थे। कोयले के धुएं की गन्ध पूरे बाजार में पसर रही थी। जलेबियां छन रही थीं, तीसी के तेल वाली गुड़ के सीरे में डूबी हुई। परात में ं रखी उन जलेबियों पर मक्खियां मंडराती और हलवाई उन्हें लकड़ी के फट्टे से हांकते। दो-चार कुत्ते जलेबी के रस से सने कागज और पत्तलों के लिए रह-रह कर लड़ पड़ते थे।
'अह... ह... ह जिलेब्बी!Ó
मुनिया को जलेबी तो खूब भाती है। मन लालची हो उठा मुनिया का जलेबी देखकर। उसने एक रूपये के सिक्के को मुट्ठी में जोर से भींच लिया। मुँह में भर आया पानी वापस गले में उतरने लगा।
'अरे... कितनी सारी मिठाई है यहां परÓ
मुनिया ने एक हाथ की ऊंगली पर मिठाईयां गिननी शुरू की, ठीक वैसे ही जैसे उसकी माई चुक्के और मटके का हिसाब करती है।Ó
'एगो मिठाई... दूगो मिटाई... अरे दू के बाद क्या कहती है माई...।Ó
कुछ देर सोचती रही मुनिया। उसने फिर गिना
'एगो मिठाई... दूगो मिठाई... ढेर सारा मिठाईÓ
मुनिया को दो से आगे गिनती नहीं आती। तभी मुनिया की नजर मुरमुरी की दुकान पर पड़ी। जमीन पर बोरे बिछाकर मुरमुरी के टीले बनाए ते बनिए ने।Ó
'अरे बाप रे... ई तो मुरमुरी का पहाड़ है। जरूर हलुमान जी ने बनाया होगा...।Ó माई कहती है कि हलुमान जी पहाड़ उठा लेते हैं। उहे ले आए होंगे। माई को बताऊंगी-मुरमुरी का पहाड़ है बाजार में। चीनी वाला घोड़ा हाथी भी है यहां।  लाल-लाल घोड़ा, पीला-पीला हाथी।Ó
मुनिया गाने लगी-'लाल-लाल घोड़ा, पीला-पीला हाथी।Ó
मुनिया की उमर के बच्चे अपने माई-बापू का हाथ पकड़े बाजार में घूम रहे थे, कुछ मुस्काते थे और कुछ रिरियाते थे। एक छुटका तो अपना माई का हाथ छुड़ा कर धूल में लोट रहा था, आंख में लोर और नाक में नेटा चुआए। ऐसा लोटा, ऐसा लोटा कि पूरा मुंह और नाक धूल से भर गया। अपनी माई से बीडिय़ा-पटाखे मांगता था। मुनिया खिलखिला पड़ी और बैठे हुए महेश के कंधों पर झूल गई। महेश खुश हो उठा अपनी बच्ची को खिलखिलाता देखकर। महेश करे भी तो क्या करे? वो भी तो चाहता है कि अपने बेटी की हर मांग पूरी करे पर पैसे की तंगी ने उसे असहाय बना दिया है।
कुछ दुकानें पटाखे, दीए, झालर और कंदीलों से सजी पड़ी थीं। चमकते दीए, चमकते पटाखे और चमकती मोमबत्तियां.. एक से बढ़कर एक सुंदर कंदीलें। सारी की सारी विदेशी-चाइनीज चमकीली वस्तुएं। पूरा बाजार चमक रहा था। सुंदर कपड़ों में सजे लोग उन दुकानों पर आते और नोटों की गड्डी निकालते। हरे नोट, गुलाबी नोट, लंबे नोट।
ए भाई... ये चुक्के किस भाव दिए?
महेश ने देखा एक धोती-कुर्ता पहने वृद्ध खड़े थे उसके सामने। मन ही मन खुश हुआ महेश-'चलो पहला खरीददार आयाÓ
उसने जवाब दिया..
पांच रुपये का एक..
 और दीए...?
जी, पांच रुपये के दो...
और गणेश-लक्ष्मी जी की मूर्ति?
पचास रुपये का जोड़ा...
'बड़ा महंगा भाव है, भाई... इस भाव में तो उन दुकानों पर इससे सुंदर समान और मूर्तियां मिल रही है, सुंदर-चटख रंगों वाली। दीये रंग-बिरंगे सितारों से सजाए गए हैं और चुक्के भी ऐसे रंगे हुए हैं मानों कलश हों।Ó उस वृद्ध ने उन चमकती हुई दुकानों की ओर इशारा किया।
'बाबा... सब मशीन से बनत है और विदेशी माल है... विदेशीÓ महेश ने अपने सामानों की वकालत की।
'भाई, उ देशी हो कि विदेशी... का फर्क पड़ता है? दो पैसे ज्यादा देकर भी अगर मन के लायक सुंदर सामान मिले तो आदमी वही खरीदेगा न?Ó
'कोई बात नहीं, बाबा... एक रुपया कम दे दीजिएगा... ले जाइए... कितने दीये-चुक्के दे दूं।Ó
महेश मोल-भाव पर उतर आया और मुनिया ने झट से गणेश-लक्ष्मी जी की मूर्तियां उस वृद्ध के हाथ में थमा ती।
'नहीं भाई, रहने दो... हम उधर से ही खरीद लेंगे।Ó
वृद्ध ने मूर्तियां वापस रखकर आगे बढ़ा तो महेश बेचारा थोड़ा निराश हो गया।
महेश और मुनिया आते-जाते लोगों को आशा भरी नजरों से देखते रहे। लोग उनकी टोकरी के पास रुकते तक न थे। एकाध, रुके भी तो उन्होंने मुनिया के खिलौनों, मूर्तियों, चुक्कों को हाथ में लेकर देखा और फिर वापस रखकर मुंह बनाते हुए अपनी राह चले गए।
शायद लोगों की आँखों में चमकीले सामानों का मोह था और विदेशी मशीनों के आगे महेश के मेहनतकश हाथ फीके पड़ रहे थे।
मुनिया ने आवाज लगाई..
'ले लो... खिलौने ले लो, दीए ले लो....।Ó
मुनिया को अब भी आस थी कि कोई न कोई उसके खिलौने, मूर्तियां जरूर खरीदेगा। उसे लम्मे लम्मे, हरे-गुलाबी नोट मिलेंगे। उसके बापू उन पैसों से मुनिया के लिए फुलझड़ी खरीद देंगे। माई खुश हो जाएगी।
मुनिया ने फिर आवाज लगाई...
'ले लो... खिलौने ले लो, दीए ले लो...।Ó
एक बार, दो बार... और न जाने कितनी बार।
दोपहर पहले शाम और फिर रात में बदल गई। अब तो बाजार भी उठने लगा था। नन्हक साह की दुकान की आग अब धीमे-धीमे बुझ रही थी और वो अंगूठे को चाट-चाट कर नोट गिनने में लगे थे। अगल-बगल के घरों में दीये जल चुके थे। मुनिया दोपहर से बाजार के शोर में खड़ी-खड़ी थक चुकी थी। बड़े बड़े पटाखों के फटने की आवाजें नाजुक-सी बच्ची को डरा जातीं। महेश के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। वो कुछ देर सुन्न-सा बैठा खैनी मलता रहा। फिर मली हुई खैनी को उसने चुटकी में उठाकर गालों में दबाया और भरी आँखों से अपनी फूल सी बच्ची की ओर देखा। वो क्या करता... बाहरी सामानों की चमक के आगे उसकी मेहनत कहीं खो सी गयी थी।
बाजार में एक-आध लोग ही बचे थे । महेश की आस टूट चुकी थी। उसने मुुनिया को गोद में उठाया और सिर पर टोकरी रखकर वापस घर की तरफ चल पड़ा। मिठाई, पटाखे-फुलझड़ी की दुकानें एक-एक करके पीछे छूटने लगीं। लेकिन मुनिया ने एक बार भी अपने बापू से फुलझड़ी के बारे में नहीं पूछा। अब उसे कोई फुलझड़ी, कोई मिठाई नहीं चाहिए थी। उसे तो बस अपनी माई के साड़ी के पल्लू में छुप कर सोना था। महेश की आखों में पानी की एक लकीर उभर आई थी जो अंधेरे में दिखाई नहीं पड़ती थी।
घर पहुंचने तक मुनिया पिता की गोद में ही सो चुकी थी। महेश ने देखा, मुनिया की माई पास के स्कूल से एक जलता हुआ दीया उठा कर ला रही है। अपने घर को रोशन करने के लिए। एक रुपये का सिक्का सोई हुई मुनिया की मुट्ठी में मौन पड़ा था और गणेश-लक्ष्मी जी की मूर्तियां टोकरी में पड़ी पड़ी मुस्कुरा रही थीं।
(परिकथा से धन्यवाद सहित)

 

ਕਵਿਤਾ
ਆਸਿਫਾ ਧੀ ਦੇ ਨਾਂਅ
ਉਫ਼! ਆਸਿਫਾ ਧੀਏ!
ਅੱਠ ਸਾਲ ਦੀ ਉਮਰ ਤਾਂ ਅਜੇ
ਤੇਰੇ ਖੇਲਣ ਮੱਲਣ ਦੇ ਹੀ ਦਿਨ ਸਨ
ਸਕੂਲ ਜਾਣ ਦੇ
ਦੁਨੀਆ ਨੂੰ ਜਾਨਣ ਦੀ
ਜੁਗਤ ਸਿੱਖਣ ਦੇ।

ਪਰ ਬੱਕਰੀਆਂ ਚਾਰਦੀ ਤੂੰ
ਬਘਿਆੜਾਂ ਦੇ ਅੜਿੱਕੇ ਆ ਗਈ ।
ਤੈਨੂੰ ਨੋਚਣ ਲੱਗਿਆਂ
ਉਨ੍ਹਾਂ ਰਾਸ਼ਟਰਵਾਦੀ ਪਸ਼ੂਆਂ ਨੂੰ
ਭੋਰਾ ਵੀ ਤਰਸ ਨਾ ਆਇਆ
ਉਹ ਕਮੀਨੇ, ਹਾਬੜੇ ਹੋਏ
ਵਾਰੀ ਦੀ ਉਡੀਕ ਕਰਦੇ ਰਹੇ
ਤੈਨੂੰ ਆਖਰੀ ਸਾਹ ਵੀ
ਆਪਣੀ ਮਰਜ਼ੀ ਨਾਲ ਨਾ ਲੈਣ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ
ਕਿਓਂਕਿ 'ਕਾਨੂੰਨ ਦੇ ਰਖਵਾਲੇ' ਨੇ
ਅਜੇ ਆਪਣੀ ਵਾਰੀ ਲੈਣੀ ਸੀ ।

ਰਾਖਸ਼ਾਂ ਦਾ ਸੰਘਾਰ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਰਣ-ਚੰਡੀ
ਉਹ ਕਾਲੀ ਮਾਤਾ ਮਰ ਕਿਓਂ ਨਾ ਗਈ
ਜਿਸ ਦੇ ਸਨਮੁੱਖ ਇਹ ਦਰਿੰਦੇ
ਤੇਰਾ ਸਰੀਰ ਨੋਚਦੇ ਰਹੇ।
ਕਾਨੂੰਨ ਦੇ ਰਖਵਾਲੇ ਵੀ
ਦਰਿੰਦਿਆਂ ਨਾਲ ਰਲ ਗਏ
ਕਿਓਂਕਿ ਤੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਧਰਮ ਦੀ
ਚਾਦਰ ਨਹੀਂ ਸੀ ਲਈ।
 
ਇਨ੍ਹਾਂ ਦਰਿੰਦਿਆਂ ਦੇ ਪੱਖ ਵਿਚ ਤਿਰੰਗਾ ਲੈ ਕੇ
ਜਦੋਂ ''ਭਾਰਤ ਮਾਤਾ ਦੀ ਜੈ'' ਦੇ ਨਾਅਰੇ ਲਗੇ
ਕਾਲੀ ਮਾਤਾ ਤਦ ਵੀ ਨਾ ਜਾਗੀ
ਅਦਾਲਤ ਵਿਚ ਤੇਰੇ ਲਈ ਇਨਸਾਫ ਲੈਣ ਵਾਸਤੇ ਨਿਤਰੀ
ਇਕ ਦਲੇਰ ਧੀ ਨੇ ਜੁਅਰਤ ਕੀਤੀ
ਤਾਂ ਕਾਨੂੰਨ ਦੇ ਰਖਵਾਲੇ ਉਸ ਨੂੰ ਵੀ
ਸਬਕ ਸਿਖਾਉਣ ਦੀਆਂ ਧਮਕੀਆਂ ਦੇ ਰਹੇ ਨੇ।

ਸ਼ਾਇਦ ਬੱਕਰਵਾਲਾਂ ਦੀ ਧੀ ਹੋਣਾ ਹੀ
ਤੇਰਾ ਵੱਡਾ ਗੁਨਾਹ ਹੋ ਗਿਆ।
''ਮਨ ਕੀ ਬਾਤ'' ਕਰਨ ਵਾਲਾ
''ਦੇਸ਼ ਦਾ ਚੌਕੀਦਾਰ''
ਕਿੱਧਰੇ ਘੂਕ ਸੁੱਤਾ ਪਿਆ ਹੈ
ਜਾਂ ਉਸ ਦੀ ਜ਼ੁਬਾਨ 'ਚ ਕੀੜੇ ਪੈ ਗਏ ਹਨ
ਉਹ ਬੋਲ ਹੀ ਨਹੀਂ ਰਿਹਾ ।

ਜੇ ਭਾਰਤ ਇਹੋ ਜਿਹਾ ਹੈ,
ਜੇ ਭਾਰਤ ਮਾਤਾ ਇਹੋ ਜਿਹੀ ਹੈ
ਤਾਂ ਫਿਰ ਮੈਂ ਇਸ ਭਾਰਤ ਦਾ
ਹਿੱਸਾ ਹੋਣ ਤੋਂ ਇਨਕਾਰ ਕਰਦਾ ਹਾਂ ।
ਮੈਂ ਉਸ ਮਾਂ ਦਾ ਪੁੱਤ ਹੋਣ ਤੋਂ ਇਨਕਾਰ ਕਰਦਾਂ ਹਾਂ,
ਜੋ ਆਪਣੀ ਧੀ ਦੀ ਅਸਮਤ ਲੁਟੇ ਜਾਣ 'ਤੇ ਵੀ
ਆਪਣੀ ਜੈ ਜੈਕਾਰ ਹੁੰਦੀ ਸੁਣ ਕੇ ਖਾਮੋਸ਼ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ !

ਆਸਿਫਾ ਧੀਏ! ਮੈਂ ਸ਼ਰਮਸਾਰ ਹਾਂ
ਮੇਰੇ ਜਿਊਂਦੇ ਜੀਅ
ਤੇਰੇ ਨਾਲ ਐਸੀ ਅਣਹੋਣੀ ਹੋਈ
ਮੈਂ ਪਰੇਸ਼ਾਨ ਹਾਂ ਕਿ
ਮੈਂ ਫਿਰ ਵੀ ਜਿਊਂਦਾ ਹਾਂ !!
ਤੂੰ ਵਿਸ਼ਵਾਸ਼ ਕਰੀਂ ਧੀਏ ਰਾਣੀਏਂ
ਮੈਂ ਤੇਰੀਆਂ ਹੋਰਨਾਂ ਭੈਣਾਂ ਲਈ
ਇੱਕ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਸਮਾਜ ਉਸਾਰਨ ਲਈ
ਅਪਣੀ ਪੂਰੀ ਵਾਹ ਲਾਵਾਂਗਾ ।
ਲੜਦਾ ਰਹਾਂਗਾ,
ਜ਼ੁਬਾਨ ਨਾਲ ਵੀ, ਕਲਮ ਨਾਲ ਵੀ,
ਤੇ ਹੋਰ ਜਿਵੇਂ ਵੀ ਲੋੜ ਪਈ।
ਤਾਂ ਜੋ ਤੈਨੂੰ ਮੇਰੇ 'ਤੇ
ਕੋਈ ਗਿਲਾ ਨਾ ਰਹੇ।

- ਤੇਰਾ ਬਾਪ
ਇੰਦਰਜੀਤ ਚੁਗਾਵਾਂ


ਗ਼ਜ਼ਲ
- ਮੱਖਣ ਕੁਹਾੜ
ਮੈਂ ਜਿਸ ਜੇਲ੍ਹ 'ਚ ਬੰਦ ਹਾਂ ਉੱਚੀ ਵਲਗਣ ਹੈ।
ਕਿਸ ਵਿੱਧ ਨਿਕਲਾਂ ਇਸ 'ਚੋਂ ਵੱਡੀ ਉਲਝਣ ਹੈ।
'ਜਚਿਐ ਬਹੁਤ ਮਖੌਟਾ ਅੱਜ ਦੇ ਦਿਨ ਦੇ ਲਈ,
ਜਦ ਵੀ ਤੱਕਾਂ ਬੋਲਦਾ ਝਟਪਟ ਦਰਪਣ ਹੈ।
ਲੱਗਦੈ ਇਹਨਾਂ ਬੱਦਲਾਂ ਨੇ ਵੀ ਨਈਂ ਵਰ੍ਹਨਾ
ਇਹਨਾਂ ਵਿਚ ਜੇ ਐਨੀ ਗਰਜਣ-ਚਮਕਣ ਹੈ।
ਰਾਹੀਆਂ ਜਿਸਨੂੰ ਤਾਰਾ ਸਮਝ ਦਿਸ਼ਾ ਬਦਲੀ,
ਅਸਲ 'ਚ ਉੱਚਾ ਉਡਦਾ ਨਕਲੀ ਚਾਨਣ ਹੈ।
ਜਿਨ੍ਹੀ ਰਾਹੀਂ ਤੁਰਦਿਆਂ ਉਮਰਾਂ ਬੀਤ ਗਈਆਂ,
ਉਹਨਾਂ ਰਾਹਾਂ ਵਿਚ ਹੁਣ ਬੇਹੱਦ ਤਿਲਕਣ ਹੈ।
ਨੇਰ੍ਹਾ ਹੈ ਤਾਂ ਖਿਝ ਨਾ ਉਠ ਕੇ ਦੀਪ ਜਗਾ,
ਚਾਨਣ ਹੀ ਤਾਂ ਆਖ਼ਰ ਅਸਲੀ ਸੱਜਣ ਹੈ।
ਬਗਲਿਆਂ, ਇੱਲਾਂ, ਕਾਵਾਂ ਮੱਲ ਲਏ ਟਾਹਣੇ,
ਚਿੜੀਆਂ, ਘੁੱਗੀਆਂ ਦੀ ਨਾ ਬੋਹੜ ਤੇ ਚਹਿਕਣ ਹੈ।

 

ਕਵਿਤਾ
ਜਿਉਂਦੀ ਮੋਈ
-ਇਰਸ਼ਾਦ ਸੰਧੂੂੂੂ
ਜਿਉਂਦਾ ਰਹਿ ਵੇ ਜੀਣ ਜੋਗਿਆ
ਮੈਥੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਰੋਟੀ ਤੂੰ ਖਾਧੀ।
ਮੇਰੇ ਹਿੱਸੇ ਦਾ ਦੁੱਧ ਵੀ ਪੀਤਾ।
ਬਾਪੂ ਨਾਲ ਮੇਲੇ ਵੀ ਵੇਖੇ ।
ਤੇਰੀ ਜੁੱਤੀ ਆਉਣ ਤੇ
ਚਾਅ ਮੈਨੂੰ ਚੜ੍ਹਿਆ ।
ਇਬਾਦਤ ਵਾਂਗੂੰ ਤੇਰੇ ਲੀੜੇ ਧੋਤੇ ।
ਮਾਂ ਨੇ ਤੇਰਾ ਗੁੱਸਾ ਵੀ ਮੇਰੇ ਤੇ ਕੱਢਿਆ ।
ਤੂੰ ਸ਼ਹਿਰ ਪੜ੍ਹਨ ਗਿਓਂ ਤੇ
ਪੂਰਾ ਪੂਰਾ ਹਫ਼ਤਾ ਤੇਰੀ ਰਾਹ ਤੱਕੀ ।
ਤੈਨੂੰ ਸੱਟ ਲੱਗੀ ਤੇ ਪੀੜ ਮੈਨੂੰ ਹੋਈ ।
ਤੈਨੂੰ ਘਰ ਮਿਲਿਆ ਤੇ ਮੈਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਨਿਕਾਲਾ ।
ਤੇਰੀਆਂ ਦਮ ਦਮ ਖ਼ੈਰਾਂ ਮੰਗੀਆਂ
ਤੈਨੂੰ ਨਿੱਤ ਨਿੱਤ ਜੀਣ ਦੁਆਵਾਂ ਦਿੱਤੀਆਂ ।
ਜਿਉਂਦਾ ਰਹਿ ਵੇ
ਜਿਉਂਦੀ ਨੂੰ ਮੋਈ ਲਿਖਵਾਉਣ ਵਾਲਿਆ ।

 

ਸ਼ਹਾਦਤ ਦੇ ਜਾਮ      - ਸ਼ਿਵਨਾਥ
ਜਾਮਾ-ਮਸਜਦ ਦੇ ਪਿੱਛਿਉ ਮੈਂ ਛੋਟੀ ਜਿਹੀ
ਇਕ ਕਬਰ ਸੀ ਵੇਖੀ
ਇਹ ਉਸ ਸਰਮਦ-ਫਕੱਰ ਦੀ ਵਿਸ਼ਰਾਮ ਜਗ੍ਹਾ ਹੈ।
ਜਿਸਨੇ ਨਾਵੇਂ ਗੁਰੂ ਲਈ ਸਨ
ਜ਼ਾਲਮ ਨੂੰ ਫਟਕਾਰਾਂ ਪਾਈਆਂ
ਤੇ ਖੁਦ ਵੀ ਸੀ ਮੌਤ ਕਬੂਲੀ।

ਦੱਸ ਰਹੀ ਹੈ ਕਬਰ ਅਸਾਂ ਨੂੰ ਬੋਲ ਕੇ
ਉਹ ਇਤਿਹਾਸ ਕੋਈ ਜ਼ੁਲਮ ਨਹੀਂ ਖੋਹ ਸਕਦਾ
ਕਿਸੇ ਮਨੁੱਖ ਦੀ ਆਤਮ-ਸ਼ਕਤੀ
ਨਾ ਕਰ ਸਕਦੈ ਸਾਹਸ ਠੰਢਾ
ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਕਿਹੜਾ ਚੱਲ ਕੇ ਆਉਂਦੈ
ਆਪਣਾ ਸੀਸ ਕਟਾਣ?

ਪਰ ਹਾਕਮ ਹਨ ਕਦੋਂ ਸਮਝਦੇ
ਮਾਨਵਤਾ ਦੀ ਬੋਲੀ
ਖੇਡ ਰਹੇ ਹੁੰਦੇ ਨੇ ਜੋ ਉਸ ਵੇਲੇ
ਖੂਨ ਦੀ ਹੋਲੀ।

ਡੁਲ੍ਹਾ ਖੂਨ ਵੀ ਰੰਗ ਲਿਆਉਂਦੈ
ਇਹ ਹੈ ਅਟੱਲ-ਸਚਾਈ
ਇਉਂ ਲਗਦਾ ਹੈ ਜ਼ਾਲਮ ਟੋਲੇ ਨੂੰ
ਇਹ ਸਮਝ ਨਾ ਆਈ।

ਐਵੇਂ ਨਹੀਂ ਕਿਸੇ ਨੇ ਸਾਰਾ
ਹਿੰਦੋਸਤਾਨ ਜਗਾਇਆ
ਇਸ ਦੀ ਖਾਤਰ ਸਿਰ ਲੱਥੇ ਹਨ
ਇਹ ਸਦੀਆਂ ਦਾ ਬਿਖੜਾ ਪੈਂਡਾ
ਕਰ ਕੇ ਹੁਣ ਤੱਕ ਆਇਆ।

ਮੈਂ ਉਸ ਕਬਰ ਦੇ ਨੇੜੇ ਹੋ ਕੇ
ਇਉਂ ਕੁਝ ਸੋਚਣ ਲੱਗਾ :
ਧੰਨ, ਜ਼ੁਲਮ ਦੇ ਰਾਹ ਵਿਚ ਆ ਕੇ,
ਉਸ ਨੂੰ ਥੰਮਣ ਵਾਲੇ,
ਪੀਂਦੇ ਆਏ ਨੇ ਹਰ ਜੁੱਗ ਵਿਚ
ਹੁਣ ਤੱਕ ਜ਼ਹਿਰ ਪਿਆਲੇ।

 

 

ਕਠੂਏ ਤੋਂ
ਆਸਿਫਾ ਧੀ ਵਲੋਂ
ਅੰਮੜੀ ਵਿਹੜੇ
- ਮੰਗਤ ਰਾਮ ਪਾਸਲਾ
ਇਹ ਕੇਹੀ ਰੁੱਤ ਆਈ ਨੀ ਮਾਂ
ਇਹ ਕੇਹੀ ਰੁੱਤ ਆਈ.....।
ਕੱਚੀ ਉਮਰੇ, ਗਲ ਮੇਰੇ ਕਿਉਂ
ਆਹ ਕਲਜੋਗਣ ਪਾਈ ਨੀ ਮਾਂ।
ਨਾ ਮੈਂ ਜਾਣਾ ਮੋਹ ਦੀਆਂ ਤਰਜ਼ਾਂ
ਉਠਦੀ ਡੋਲੀ ਦੇਖ ਕੇ ਡਰਜਾਂ।
ਦਸ ਖਾਂ ਮੇਰੀ ਕੋਰੀ ਦੇਹ ਕਿਸ
ਹਵਸ ਦੀ ਕੁੰਜ ਚੜ੍ਹਾਈ ਨੀ ਮਾਂ।
ਬੱਕਰਾਂ ਨਾਲ ਮੈਂ ਗੀਟੇ ਖੇਡਾਂ
ਕਰਨ ਛਲੇਰੂ ਸਾਨੂੰ ਝੇਡਾਂ।
ਹੱਥਾਂ 'ਤੇ ਸ਼ਗਨਾਂ ਦੀ ਮਹਿੰਦੀ
ਅਜੇ ਨਾ ਅਸੀਂ ਲੁਆਈ ਨੀ ਮਾਂ।
ਉਹ ਤਾਂ ਮੇਰੇ ਬਾ ਵਰਗੇ ਸਨ,
ਜਾਂ ਫਿਰ ਸਕੇ ਭਰਾ ਵਰਗੇ ਸਨ।
ਫੁੱਲਾਂ ਵਰਗੇ ਸੁੱਚੇ ਤਨ 'ਤੇ
ਕਾਹਤੋਂ ਕਰੀ ਚੜ੍ਹਾਈ ਨੀ ਮਾਂ।
ਉਹ ਵੀ 'ਮਾਂ' ਸੀ, ਤੂੰ ਵੀ ਮਾਂ ਏ
ਇਹ ਤਾਂ ਇਕ ਸਕੂਨ ਦਾ ਨਾਂ ਏ।
ਅੰਮੜੀ ਵਿਹੜੇ ਕੋਹ ਕੇ ਫਿਰ ਕਿਉਂ
ਧਰਮ ਦੀ ਦੇਣ ਦੁਹਾਈ ਨੀ ਮਾਂ।
ਨਾ ਉਹ ਬੋਲੀ, ਨਾ ਉਹ ਕੁਸਕੀ
ਨਾ ਗਲੇ ਲਗਾਇਆ, ਜਦ ਮੈਂ ਡੁਸਕੀ।
ਅੰਨ੍ਹੀ, ਬਹਿਰੀ, ਗੁੰਗੀ ਅੱਗੇ
ਅਭਾਗਣ ਕਿਉਂ ਕੁਰਲਾਈ ਨੀ ਮਾਂ।
ਸੁਖੀ ਵਸੇ ਮੇਰੇ ਬਾਪ ਦਾ ਵਿਹੜਾ
ਕੰਜਕ ਦਾ ਦੁੱਖ ਸਮਝੇ ਜਿਹੜਾ।
''ਆਸਿਫਾ'' ਫਿਰ ਅਰਸ਼ਾਂ ਤੋਂ ਆਵੇ,
ਪਿੰਡ ਨੂੰ ਦੇਣ ਵਧਾਈ ਨੀ ਮਾਂ।

- Posted by Admin