sangrami lehar

संभल जाओ ऐ हिन्दोसतां वालों

  • 06/02/2018
  • 11:06 AM

मंगत राम पासला
संप्रदायिक-फाशीवादी शक्तियां दुत्र गति से निर्भय होकर आगे बढ़ रही हैं। राजस्थान में लव जिहाद के नाम पर शांभू लाल रेगर नामी व्यक्ति ने एक मजदूर मौहम्मद अफराजुल के पहले निर्दयता सहित कुल्हाड़े से टुकड़े-टुकड़े कर दिये ततपछ्चात उसके मतृ जिसम पर मिट्टी का तेल छिडक़ कर उसे आग के हवाले कर दिया। उपरांत इस सारे कुकृत्य को दर्शाता, आग उगलते भाषण समेत एक विडियो भी जारी कर दिया ताकि आम लोगों की रूह भय से कांप उठे। साधारणत: इस अमानवीय करतूत और इसे अंजाम देने वाले शंभूलाल के प्रति घृणा उतपन्न होनी चाहिये। किन्तु इसके विपरीत 516 लोगों ने उसके इस ‘कारनामे’ से खुश होकर शंभूलाल के खाते में 3 लाख रुपये जमा करा दिये। इस गैर संवेदी-अमानवीय जुर्म करने वाले को नायक भी तरह पेश करने वालों में से दो लोगों, जो इस चन्दे की रसीद सोशल मीडियां पर दिखा रहे थे, को पुलिस ने कानून की अति साधारण धाराओं (धारा 151) के तहत हिरासत में लिया। इस दिल दहला देने वाली घटना के संदर्भ में की गई पुलिस कार्यवाही वस्तुत: प्रशासन एवं अपराधियों के बीच मिलीभुगत को ही दर्शती है, क्यूंकि धारा 151 से नरम कानून में कोई धारा ही नहीं है। जबकि चन्दा एकत्र करने वालों का जुर्म हत्या के लिये उकसाने तथा सांप्रदायिक सौहार्द को क्षति पहुंचाने की धाराओं के अधीन बनता है।
इसी तरह की एक अन्य दर्दनाक घटना रात 8 दिसंबर को बिहार के भागलपुर में घटित हुई जहां संघी गुर्गों और पुलिस द्वारा एक दलित औरत की बेतरस पिटाई ही नहीं की गयी बल्कि उसे बीच चौराहे पर निर्वस्त्र भी कर दिया। यह चीरहरण पांच पांडवों की द्वौपदी का न होकर एक दुखियारी दलित औरत का किया गया और संघी मनुवादियों ने इस घटना को अंजाम दिया स्त्रियों पर पुरुषों और दलितों पर सर्वणों की वरीयता प्रर्दशित करने के लिये।
देश में घटित ऐसी घटनाओं की जहां एक ओर कोई कमी नहीं, वहीं दूसरी और ऐसी घटनाओं में व्यापत दरिंदगी की भी कोई सीमाएं शेष नहीं रहतीं। प्रतिदिन पुलिस प्रशासन की अनदेखी एवं सरंक्षण के चलते संघी संगठन इन घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। अगर कोई कमी तो वह है इन अमानवीय कृत्यों के विरुद्ध जन साधारण को जागृत एवं संगठित करने की ताकि वे इन दरिंदों के विरुद्ध सक्रिय संर्घषों की झड़ी लगा दें। प्रधान मंत्री के किसी वक्त्वय या आश्वासन पर भरोसा करने का समय अब गुजर गया है। कातिल गिरोह बेखौफ मोर्चे संभाले हुए हैं। प्रगतिशील लोग, अल्पसंख्यक विशेषकर मुसलमान, दलित एवं महिलाएं उनके हमलों की जद में हैं। भ्रम में न रहें। सिक्खों समेत अन्य अल्पसंख्यक तथा विशाल हिन्दु जनसंख्या जो ऐसे कारनामों से सहमत नहीं वे भी जल्द ही भगवां बिग्रेड के इन हमलों की काद में आने वाले हैं। सिरफिरे हत्यारों की रक्तपिपासा कभी समाप्त नहीं होती।
आर्थिक मुहाज पर भी देश लगभग तबाही की कगार तक पहुंच गया है। विगत वर्ष नौकरियों में 80प्रतिशत की कमी हुई। सभी काम, क्रूर ठेका पद्धति के हवाले हैं जहां कोई वेतनमान, काम का निश्चित समय, पैंशन तथा अन्य समाजिक सुरक्षा नियम नहीं है। जब श्रम कानून ही नहीं तो उल्लंघन कैसा और कार्रवाई कैसी? विकास तो दृश्यमान होगा किन्तु विकास के लाभ ढूंढे भी न मिलेंगे। अब मोदी माडल कहिये या मनमोहन माडल! निजी अस्पताल, स्कूल, कालेज, यूनीर्वसटियां, बैंक, माल (बड़े हाट) सब कुछ आखे चुंधियायेगा। परंतु इस परिदृष्य में उद्यौगिक मजदूर, दिहाड़ीदार श्रमिक, कंगाली एवं समाजिक जुल्मों से त्रस्त दलित, गरीब एव सीमांत कृषक, छोटे दुकानदार, भाव अपने हाथों नेक कमाई करने वाला कोई कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होगा। ये लोग या तो कर्ज के सताये आत्महत्याएं करेंगे या जीवन यापन के लिये निम्न से निम्न स्तर का कार्य करते पाए जाएंगे। दवाएं उपलब्ध होंगी पर खरीदने का सार्मथ्य न होगा। फंडों/फीसों के अभाव में भावी पीढिय़ों शिक्षा संस्थाओं का मुंह न देख सकेंगी। संभव है, खुद के लिये नशा तलाशने या किसी अन्य को अपने जैसा नशेड़ी बनाने का जुगाड़ लगाते बेकार युवा चौराहों पर भटकते मिलें। पूंजीवादी विकास जेब ही नहीं बुद्धि एवं दिमाग भी कंगाल करता है। ये मनुष्य के स्वाभिमान को भी तार-तार करता है।
मजबूरीवश लोग अपने दुखों को भुलाने एवं कुछ देर की  कथित आत्मिक खुशी की प्राप्ति के लिये डेरों आदि पर जाकर दकियानूसी प्रवचन सुनेगे जो लोगों को और भी लाचार एवं गुलाम मानसिकता का बनाते हैं। यह डेरे एवं प्रवचन परजीवी लूटेरे वर्गों का बुना हुआ मकडज़ाल है। यही नहीं इन स्थलों पर नौजवानों एवं भावी पीढिय़ों को तबाह करने वाली लचरता भी परोसे जाना अब तो आम बात हो गई है।
उपरोक्त ‘‘विकास’’ माडल के पक्षधर किसी भी राजनैतिक  दल या इनके तथाकथित ‘‘मकबूल’’ नेताओं द्वारा कहे शब्द, चुनावी आश्वासन एवं घोषणा पत्र, नारे, भाषण सभी खोखले एवं धोखा हैं। लोगों की अकांक्षाओं की पूर्ति हेतू वर्तमान राजनैतिक प्रबंध की दशा एवं दिशा के साथ नींव बदलना अनिवार्य है, जो यह दल कदापि नहीं चाहते। लोगों को भरमाने हेतु इनके द्वारा किये गये नग्णय उपाय लोगों का कुछ नहीं संवार सकते। लोगों की मूल समस्याएं दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही हैं। यह याद रखना चाहिये कि लोगों की समस्याओं का स्थायी हल इस लुटेरे प्रबंध को बदल कर ही किया जा सकता है। मुफ्त आटा-दाल, लैपटाप, साईकल, बिजली आदि देना असल तो छलावा मात्र ही होते हैं और अगर कहीं कुछ दिया भी जाता है तो इस से कहीं अथिक भांति-भांति के टैक्सों द्वारा लोगों से निचोड़ लिया जाता है। वैसे भी भीख प्रवृति मनुष्य के मन मस्तिक से सम्मान से जीने की चेष्टा समाप्त कर देती है। सो यही वो समय है जब लोगों को जागृत एवं संगठित करते हुए वर्तमान लूट आधारित प्रबंध को नेस्तानाबूद कर नया लोकपक्षीय प्रबंध निर्मित करने के संघर्षों की शुरूआत की जाए।
उक्त उद्देश्य की प्राप्ति के लिये सभी श्रमिकों, दलितों, कृष्कों, दुकानदारों, युवकों-विद्यार्थियों, महिलाओं का सांझा संघर्ष एवं आंदोलन अवश्यंभावी है जिसमें सभी धर्म जाति, धर्म, क्षेत्र भाषा-भाषी मेहनतकशों की सरगर्म भागीदारी हो। शासक वर्गो के प्रतिनिध दलों से निकटता बनाकर चलने वाले वामपंथी दलों के नेताओं तथा दूसरी ओर केवल संघर्षों पर ही टेक रखने एवं वैकल्पिक राज्यप्रबंध से लोगों को अनभिज्ञ रखने के पक्षधर संगठनों से सनिम्र निवेदन है कि वे वैकल्पिक लोक पक्षीय राज्य प्रबंध की स्थापना के संघर्ष भी निर्मित करें। मेहनतकशों का अपना राज्यप्रबंध स्थापित करने की दिशा के संग्रामों से कटे रहना तथा केवल संघर्ष ही करते रहना कभी भी लाभकारी नहीं हो सकता। इस राह में दरपेश संभावित मुसीबतों एवं असफलताओं से घबराा कर कन्नी काटने की बजाए, स्थापति का मुकाबला करने के उचित दावपेचों की योजनाबंदी ही सही मायने में लाभकारी होगी।
देश में दनदना रही एवं मजबूती प$कड़ रही फासीवादी-धार्मिक उन्मदी शक्तितों पर रोक लगाने एवं विनाशकारी आर्थिक माडल के मुकाबले एक लोक हितैषी राजनैतिक-आर्थिक विकल्प के निर्माण का सही समय आ गया है। अगर हम इस चुनौती से पार पाने में असफल रहते हैं तो फिर वोही होगा जो आलामा ईकबाल ने चेताया था...
संभल जाओ, ऐ हिन्दोस्तां वाले,
न समझोगे तो मिट जाओगे,
तुम्हारी दास्तां तक न होगी दास्तानों में।

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