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आर.एम.पी.आई. के प्रथम अखिल भारतीय पार्टी सम्मेलन का महत्त्व

  • 09/01/2018
  • 10:38 AM

हरकंवल सिंह

भारतीय क्रांतिकारी माकर््सवादी पार्टी (आरएमपीआई) के 23 से 26 नवंबर 2017 तक, चंडीगढ़ में सफलतापूर्वक संपन्न हुए प्रथम अखिल भारतीय पार्टी सम्मेलन ने अनेकों उत्साहवद्र्धक संभावनाएं उजागर की हैं। इस चार दिवसीय सम्मेलन में शामिल हुए लगभग तीन सौ प्रतिनिधियों एवं पर्यवेक्षकों ने भारतीय जन समूहों समक्ष खड़ी आर्थिक समाजिक चुनौतियों के बारे में गहन विचार विर्मश किया। इस गहन चिंतन मनन के आधार पर ही सम्मेलन द्वारा महत्त्वपूर्ण सैद्धांतिक-राजनैतिक दस्तावेज प्रवाण किये गये हैं तथा भविष्य के जनआंदोलनों की जरूरतों के अनुरूप  तथा संगठन की मजबूती हेतु जरूर कार्यों की योजनाबंदी की गयी है। सम्मेलन द्वारा जहां कम्यूनिस्ट आंदोलन की अमूल्य प्राप्तियों को विनम्रता से रेखांकित किया गया है वहीं भविष्य की आवश्यकताओं के अनुसार नवीन लक्ष्य भी तय किये गये हैं। इन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अपनाई जाने वाली संग्रामी सरगर्मी को सूत्रबद्ध करते हुए कुछ नये सैद्धांतिक संकल्प भी शामिल किये गये हैं।
इन सभी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए भारतीय प्रस्थितियों का माकर््सवादी वैज्ञानिक दृष्टि से आकलन करते हुए वर्तमान राजनैतिक-आर्थिक ढांचे के संदर्भ में, 1964 में अपनाये गये प्रोग्राम की समझ के आधीन, ‘लोक जनतांत्रिक क्रांति’ की सफलता के लिये वर्ग संघर्ष को निरंतर तेज और विकसित करने का प्रण दोहराया गया। साथ ही यहां की घृण्त मनूवादी समाजिक संरचना के चलते लोगों के विशाल भाग पर सदियों से होते आ रहे समाजिक अन्याय एवं संस्थागत अत्याचारों को भी गंभीरता सहित नोट किया गया है। इसी वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित ‘‘भारत में वर्ग हीन, जाति विहीन, स्त्री-मर्द के हकीकी समान अधिकारों वाले न्यायसंगत सैकूलर समाज के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।’’
मनूवादी समाजिक दृष्टिकोण के चलते करोड़ों लोग ऐसे है जो उपजीविका के सभी साधनों से से वंचित है। तथाकथित ‘‘नीची’’ जातियों में जन्म लेने वाले ये धरतीपुत्र कई हजार सालों से अमानवीय समाजिक जुल्मों का शिकार बनते चले आ रहे हैं। वे न केवल साधन संपन्न लोगों के आर्थिक शोषण से पीडि़त हैं बल्कि घोर समाजिक अन्याय एवं दुराग्रहों तले भी बुरी तरह पिस रहे है। इन जाति पूर्वाग्रहों पर आधारित भेदभावपूर्ण व्यवहार ने इन करोड़ों देशवासियों को आज भी संस्थागत त्रिस्कार का पात्र बना रखा है जो उनके साथ आजीवन चलता है। यहां तक कि इन के लिये, समाजिक प्रगति के हर दौर में बौद्धिक विकास की सभी राहों के किवाड बंद रखे जाते रहे हैं तथा यह घटीया प्रयास आज भी थमें नहीं हैं। अतीत में इन से पशु तुल्य व्यवहार किया जाना आम बात थी। यह घटनाक्रम, देश में उपलब्ध प्राप्ति कुदरती संसाधनों के उचित इस्तेमाल की राह में बाधक बना तथा देश के योग्य आर्थिक विकास के भी आड़े आया। इसी पृष्ठभूमि में, भारतीय समाज के इस अति पिछड़े भाग में आत्म सम्मान की नयी चिंगारियां फूट रही है। मनूवादी अत्याचारों पर आधारित समाजिक संचरना के विरुद्ध विद्रोह की घटनाएं घटित हो रही हैं। जातपाती कलंक से सदैव सदा के लिए मुक्ति की इस चेतना को एक विशाल एवं प्रगतिशील, क्रांतिकारी संघर्ष में परिर्वतित करना लोक जनतांत्रिक क्रांति का एक प्रमुख ध्येय होना चाहिये। यह वैज्ञानिक समझदारी इस सम्मेलन द्वारा सर्वप्रथम अवश्यक बल देते हुए उभारी गयी है।
भारतीय समाज की एक और प्रमुख त्रासदी है। यहां, आधी आबादी यानि स्त्रियो अभूतपूर्व अन्यायों एवं भेदभाव से बुरी तरह पीडि़त हैं। कभी मातृप्रधान रहे इस देश में, मनुवादी संस्थाओं ने स्त्री को दासी का दर्जा दे दिया है। वर्तमान पित्रसत्तावादी प्रबंध में, नारी मुक्ति की एवं सम्मान की खोखली बातों की भरमार है, अपितु वास्तव में स्त्रियां हर क्षेत्र में भेदभाव से पीडि़त हैं जो अत्याधिक खेदजनक है। हालाकि हर क्षेत्र में स्त्रियों ने अपनी क्षमताओं एवं बौद्धिक-मानसिक संभावनाओं का आशाजनक प्रदर्शन किया है। पच्छिमी देशों से आयातित लचर साम्राज्यवादी संस्कृति की आमद से तथा संघ परिवार के दिशा निर्देशों अधीन मनूवादी सरोकारों की पुर्नसुरजीती के कुउद्देश्य से किये जा रहे तीखे प्रचार एवं प्रयासों के चलते औरतों के मान-सम्मान को छिन्न भिन्न करने वाले शरीरक शोषण की मंशा के हमले तथा घरेलू एवं समाजिक अत्याचारों में अभूतपूर्व वृद्धि हो रही है। दलित परिवारों से संबंद्ध स्त्रियों की स्थिति तो इस पक्ष में और भी डरावनी है। इन सभी भेदभावों, अन्याय तथा लैंगिक हमलों को खत्म करने वाले शक्तिशाली संघर्ष भी लोक जम्हूरी इंकलाब का एक अहम कार्य है। सम्मेलन द्वारा यह ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है कि पित्रसत्ता के विरुद्ध अंगडाईयां ले रही नारी मुक्ति की इस लहर को भी क्रांतिकारी अंदोलन के अविभाज्यीय अंग के तौर पर प्राथमिकता दी जायेगी।
आर.एम.पी.आई. के इस प्रथम सम्मेलन ने क्षमिक वर्गो की मौजूदा चरण में हो रही साम्राज्यवादी एवं पूजी की लूट के सदैव खात्में के लिए जरूरी विशाल जनसंग्राम को, भारत की विशेष प्रस्थितियों में,जाति उत्पीडऩ के खिलाफ बलवती हो रही दलित चेतना एवं नारी मुक्ति के आंदोलनोंसे आत्मसात करते हुए एक विशाल क्रांतिकारी जन आंदोलन के निर्माण का संकल्प लिया है, और यह संकल्प अंतत: लोक जम्हूरी क्रांति का पथ प्रर्दशित करने में सक्षम होगा।
सम्मेलन द्वारा विशाल जन आधार वाली क्रांतिकारी लहर के निर्माण हेतू पार्लीमानी एवं गैर पार्लीमानी संघर्षों का उचित विवेक से सम्मेल करते हुए आगे बढ़ुने का निर्णय लिया गया है। किन्तु यह भी एतिहासिक सत्य है कि क्रांतिकारी  समाजिक परिवर्तन के पक्ष में वर्गीय शक्तियों के समतोल में निर्णायक परिवर्तन के लिए सदैव गैर पार्लीमानी संघर्षों को प्रमुखता दी जाएगी। वास्तव में क्रांतिकारी संघर्ष को विजयी बनाने के लिए गैर पार्लीमानी संघर्षों को पहल न देने के बारे में सोचना भी इस दिशा में आत्मघाती भूल होगी। भारत में जहां एक ओर परंपरागत वाम शक्तियां पार्लीमानी अवसरवादी भटकावों के चलते बुरी तरह अप्रसंगिक होती जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर मध्यम वर्गीय रोमांसवादी क्रांतिकारी दुरग्रहों के चलते वाम का एक भाग अराजक मार्केबाजी के निरर्थक क्रियाकलायों में लिप्त है। सम्मेलन द्वारा इस दिशा में समयानुसार समझदारी दिखाते हुए योग्य निर्णय किये गये
देशवासियों को वर्तमान राजनैतिक परिदृष्य में दरपेश समस्याओं के फौरी समाधान हेतु विचारे गये राजनैतिक प्रस्ताव में चार मुख्य बातें विशेष तौर पर उभरीं। सर्वप्रथम; भारतीय शासक वर्गों का, साम्राज्यवादियों से देश के दीर्घकालीन हितों को दरकिनार कर, युद्धनीतक समझौते किये जाने के आत्मघाती रास्ते पर बढऩा। इस विषय में, यह याद रखना भी उचित होगा कि 2008 में उभरे संसार आर्थिक संकट पर काबू पाने में साम्राज्यवादी शक्तियां की घोर असफलता एवं इस असफलता से उपजी लोक बेचैनी का लाभ लेते हुए विभिन्न देशों के दबाव के चलते उक्त संकट का भार विकासशील देशों पर लादने के खतरनाक मंसूबों को दरकिनार करते हुए भारतीय शासक वर्ग साम्राज्यवादियों से आर्थिक एवं युद्धनीतिक गठजोड़ों को और तगड़ा करने के दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। इस से न केवल देशवासियों की आर्थिक समस्याओं में बढ़ौत्तरी हो रही है बल्कि देश की सुरक्षा के अतिसंवेदनशील आयामों से भी खतरनाक खिलवाड़ किया जा रहा है। प्रस्ताव का दूसरा मुद्दा है कि भारतीय शासकों द्वारा अमल में लाई जा रही नवउदारवादी नीतियों का प्रतिदिन अधिक तेजी से दृष्टिगोचर हो रहा खोखलापन। इन विनाशकारी नीतियों के चलते हो रहे जिस रोजगारहीन विकास का झूठी दलीलो के सहारे पहले यू.पी.ए.-1 एवं 2 ढिंढोरा पीटती थीं उसी झूठे प्रचार के हथकंडे वर्तमान मोदी सरकार भी अपना रही है। जबकि वास्तविकता यह है कि इस तथाकथित विकास ने रोजगार के पहले से चले आ रहे संसाधनों के खात्में की भूमिका अदा की है। बेरोजगारी एवं अद्र्ध बेरोजगारी के शिकार युवा भारी निराशा के आलम में हैं। निजीकरण एवं मंडी की निर्दयी ताकतों को मिली अभूतपूर्व खुली छूट के चलते न केवल महंगाई ने लोगों की कमर तोड़ दी है अपतु खेती उपज को भी मंडी में कुड़े की तरह सड़ता छोड़ दिया है। यही मुख्य कारक है जिसके चलते खेतीहर मजदूरों एवं किसानों की आत्महत्याओं की संख्या में भयावह बढ़ौत्तरी हो रही है। ठीक इन्हीं नीतियों के चलते आर्थिक असमानताएं भी भयानक रूप धारण कर चुकी है। तथा चहुँ ओर भ्रष्टाचार संस्तागत रूप में सुरक्षा की भांति बढ़ रहा है। इन्हीं जन विरोधी नीतियों पर और मजबूती से अमल की भावना से लागू की गई नोटबंदी के भी ऐलाने गये बड़े बड़े उद्देश्यों के विपरीत विस्फोटक नतीजे निकले हैं। इस निर्राथक नोटबंदी एवं जीएसटी ने आम लोगों को कोई राहत देने के उलट छोटे कारोबारों की व्यापक तबाही की है। किसानों एवं कृषि की हानि के साथ दैनिक उपभोग की वस्तुओं के भाव राकेट की तेजी से बढ़े हैं। फलस्वरूप लोगों के मुश्कलों मे भारी वृद्धि ही हुई है। इस प्रस्ताव का तीसरा प्रमुख केंद्रबिंदू है मोदी सरकार के सांप्रदायिक-फासीवादी क्रियाकलायों का विश्लेषण। यह नोट किया गया है कि मोदी सरकार, संघ परिवार के भारत को एक कट्टर धर्म आधारित राज्य के रूप में परिर्वतित करने की कुचेष्टाओं को तेजी से अमल में लाने के सभी प्रयासों में पूरी शक्ति से मदद कर रही है। इस साजिश के चलते संघी कार्यकत्र्ताओं द्वारा अल्पसंख्यकों के रहन-सहन के तौर-तरीकों तथा सांस्कृतिक मूल्यों पर तेजी से योजनाबद्ध हमले किये जा रहे हैं। वैचारिक एवम सांस्कृतिक असहनशीलता को पूरी शह दी जा रही है। यह रुझान अल्पसंख्यकों में भय तथा असुरक्षा बढ़ाने के अलावा देश की एकता अखंडता के लिये भी भारी खतरे का सूचक है। यह भी सर्वविदित है कि इन घृणित क्रियाकलायों द्वारा हो रेह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से मोदी सरकार एवं भाजपा भारी चुनावी लाभ अर्जित कर रहे हैं। परंतु यह भी सत्य है कि मोदी सरकार की इस सांप्रदायिक फाशीवादी पहुंच के चलते धर्मनिरपेक्ष तथा जन तांत्रिक संवैधानिक मूल्यों का बहुत नुकसान हो रहा है।
भारतीय शासकों द्वारा अमल में लाई जा रही साम्राज्यवाद निर्देशित पूंजीपरस्त नीतियों को हराने के संग्राम के साथ ही मोदी सरकार इस सांप्रदायिक फासी हमले का भी मूंह मोडऩा आज की महती जिम्मेदारी है।
प्रस्ताव में यह रेखांकित किया गया है कि उपरोक्त वर्णित संघर्षों की सफलता हेतु विशाल जन सर्मथन जुटाने के लिए वाम जानतांत्रिक एकता आज की ऐतिहासिक जरूरत है। बेशक वाम पक्ष कमजोर एवं अनेक मुद्दों पर बंटा हुआ है। परंतु इस के बावजूद भी वाम जनतांत्रिक शक्तियों के संघर्षशील शक्तियों से एकजुटता एवं दखल आज भी चमत्कारी नतीजे देने में सुक्षम है।
सम्मेलन द्वारा तव्रित एवं दीर्घकालीन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लैनिनवादी दिशा निर्देशों पर आधारित क्रांतिकारी पार्टी के निर्माण की दिशा में भी निर्णय लिये। इस दिशा में पार्टी के संविधान में संशोधन किये गये। जनवादी कार्यक्रप्रणाली विकसित करने तथा सामूहिक नेतृत्व स्थापित करने के उद्देश्य से ठोस निर्णय लिये गये। जनवादी केंद्रवाद की मजबूती के अलावा हर स्तर पर दो या तीन नेताओं का चयन करने एवं उन्हें बाकायदा जिम्मेवारियां बांटने की व्यवस्था बनाई गई है। एक ऐसी पार्टी बनाने का ध्येय निश्चित किया गया है जो माक्र्सवाद-लेनिनवाद की वैज्ञानिक शिक्षाओं से लैस हो, ताकतवर लोक जनवादी मोर्चा की उसारी से सक्षम हो’ एवं जो ‘भारतीय जनसमूहों की उन शानदार रियायतों को आत्मसात करने तथा आगे बढ़ाने के योग्य हो जो उन्हों ने हर युग में हर प्रकार के जालिमों एवं लुटेरों के खिलाफ त्याग भरपूर संघर्षों द्वारा स्थापित की हों।’
उपर वर्णित सभी निर्णयों तथा स्थापनाओं पर सुहृदता से किया गया अमल ही देश में एक वास्तविक क्रांतिकारी पार्टी के प्रफुल्लित होने की गरंटी है।

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