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मनुवादी दासता व पूंजीवादी लूट के विरुद्ध दलित चेतना व संघर्ष विकसित व मजबूत करने की आवश्यकता

  • 07/07/2018
  • 03:54 PM

जागो! संगठित हो!! वर्गविहीन, जातिविहीन व नारी मुक्ति की ओर अग्रसर सैकुलर समाज के निर्माण के लिये संघर्ष करो!!!

मंगत राम पासला
पिछले दिनों, 2 अप्रैल को, दलित समाज से सहयोग करते हुए जनवादी व क्रांतिकारी पक्षों द्वारा किये गये ‘भारत बंद’ को वर्गीय संघर्षों के इतिहास में एक नया मील-पत्थर कहा जा सकता है। यह जन कार्यवाही, महाराष्ट्र के एक सरकारी कर्मचारी द्वारा अपने विभाग में हुई एक ज्यादती के बारे में सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई एक रिट पटीशन के संबंध में दो जज साहिबान के बैंच द्वारा किये गये निर्णय के विरुद्ध रोष प्रकट करने के लिए की गई थी। 20 मार्च 2018 को दिये गये इस निर्णय में जज साहिबान ने यह टिप्पणी की है कि अनुसूचित जाति/जन जाति (अत्याचार रोक) एक्ट 1989 का दुरुपयोग होता है। इस दुरुपयोग को रोकने के लिये, उनके अनुसार, इस कानून के अधीन केस दर्ज करने से पहले पीडि़त द्वारा लगाये गये दोषों की डी.एस.पी.रैंक का अधिकारी जांच करे, दोषी को पेशगी जमानत करवाने की आज्ञा हो, दोषी कर्मचारी होने की सूरत में उसे गिरफ्तार करने से पहले उसके अधिकारियों से आज्ञा ली जाये तथा यदि दोषी साधारण व्यक्ति हो तो उसे गिरफ्तार करने से पहले जिले के एस.एस.पी. से आज्ञा ली जाये। यहां यह याद रखना जरूरी है कि इस कानून में अपराध में किसी दलित के लिये केवल जातिसूचक शब्दों का उपयोग करना या कोई अन्य आपत्तिजनक टिप्पणी करना ही शामिल नहीं है,  बल्कि इसमें किसी अनूसूचित जाति/जनजाति का कत्ल करना, मारपीट करना, दलित वर्ग से संबंधित औरत से छेड़छाड़ या बलात्कार करना तथा अन्य हर तरह के अपमानजनक व्यवहार करना आदि भी
शामिल हैं।
उपरोक्त निर्णय के अनुसार इस टिप्पणी का कारण इस कानून के दुरुपयोग को रोकना बताया गया है, अर्थात किसी अपराध के सच्चे या झूठे होने का निर्णय करने का अधिकार न्यायपालिका की जगह पुलिस के अधिकारी या अफसरशाही (कार्यपालिका) को दे दिया गया है। एक पीडि़त व्यक्ति (दलित) की गुहार, वर्तमान समय में, जिला पुलिस अधिकारी या नियुक्तिकर्ता कितनी सुनेगा, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है? वैसे तो पूंजीवादी समाज में समस्त मेहनतकशों के लिये अपने साथ हर पल हो रहे अन्याय की अनेकों घटनाओं के बारे में शिकायत करके न्याय की आशा करनी भी एक सपने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, परंतु मौजूदा संविधान की सीमाओं के दायरे में सदियों से सामाजिक पीड़ा का दर्द सह रहे दलितों व अन्य बहुत सी कथित नीची जातियों से संबंधित लोगों को स्वाभिमान से जीने का अधिकार कैसे प्राप्त हो; इसके बारे में अंदाजा लगाना तो कोई भी आश्चर्यजनक बात नहीं लगती है।
निर्णय का तर्कविहीन आधार
भारत के संविधान में, अनुसूचित जाति/जनजाति पर हो रहे अत्याचारों को रोकने से संबंधित आवश्यक कानून बनाने की प्राथमिकता दर्ज करने के बावजूद, पहले तो लगभग 40 वर्षों तक ऐसा कानून बनाने के बारे में किसी भी सरकार ने पहलकदमी ही नहीं की। वी.पी. सिंह की सरकार के समय मंडल कमिशन का मुद्दा उभरने के उपरांत यदि 1989 में यह कानून अस्तित्व में आया, तो भी इस को लागू करने की दर बहुत ही सुस्त रही। क्योंकि गरीबों विशेषतय: दलितों से ज्यादतियां करने वाले व्यक्ति अक्सर धनवान या फिर उच्च अधिकारियों की श्रेणी से संबंधित होते हैं, इसलिये वे ऐसी शिकायतों को अपने राजनैतिक व प्रशासनिक प्रभाव से अक्सर ही दबा देते हैं। इस दुखद: अवस्था के विरुद्ध संबंधित पीडि़तों के भीतर बढ़ रहे रोष को शांत करने के लिये इस कानून में 2016 में यह संशोधन करने के लिये भी सरकार को मजबूर होना पड़ा कि यदि कोई पुलिस अधिकारी ऐसी शिकायत तुरंत दर्ज नहीं करता तो उसके विरुद्ध भी कानून के उल्लंघन का केस दर्ज किया जाये। इसके बावजूद यदि इस कानून के 1989 में लागू होने के बाद समूचे देश में इसके दुरुपयोग की उदाहरणें गिनी जायें, तो उनकी भी सूची बनाई जा सकती है। परंतु, इस वर्ग के लोगों से अमानवीय सामाजिक उत्पीडऩ, जो कि प्रतिदिन ही देश के शहरों, गांवों, मुहल्लों, गलियों व घरों में किया  जा रहा है, उसका न कोई रिकार्ड रखना संभव है तथा न ही उनकी आंकड़ों में गणना ही की जा सकती है। यह अमानवीय उत्पीडऩ धरती के इस हिस्से में हजारों सालों से सरेआम चल रहा है। वैसे सम्मानीय जज साहिबान क्या संविधान में दर्ज देश के किसी कानून का नाम बता सकते हैं, जिसका दुरुपयोग ना हो रहा हो? भारतीय दंड कानून की धारा 302, 307, 326, 107, 151 का विरोधी पक्षों के विरुद्ध दुरुपयोग शासक वर्गों की राजनीतिक पार्टियों व धनवान लोगों के लिये मनोरंजन बन गया है। ऐसे कई कानूनों का दुरुपयोग करके ही लोगों के अरबों रुपये हड़पने वाले काले धंधों के कारोबारी गिरोह व कारपोरेट घराने अरबों-खरबों पति बन गये हैं। थोड़े समय पहले ही विजय माल्या व नीरव मोदी जैसे ठगों ने बैंकों में लोगों की गाढ़े पसीने की करोड़ों रुपये की जमा कमाई डकार ली है। यहां यह प्रश्न भी उभरता है कि क्या कानून का दुरुपयोग रोकने के लिये न्यायिक प्रक्रिया की जगह कार्यपालिका व अफसरशाही को अधिकार देना उपयुक्त होगा? क्या ऐसा करने से यह दुरुपयोग रुक जायेगा? बिल्कुल भी नहीं; क्योंकि ऐसे समस्त कुकर्मों में कार्यपालिका व अपराधियों के बीच कहीं ना कहीं मिलीभूगत अवश्य कार्य कर रही होती है।
दयनीय जीवन स्थितियां
दलित समाज व अन्य पिछड़ी जातियों के लोग शताब्दियों से ही सामाजिक उत्पीडऩ को झेल रहे हैं। समाज की सेवा की जिम्मेदारी, जिसकी ओर अन्य जातियों के लोग मुंह तक नहीं करते, सिर्फ यही दलित समाज निभाता है। सीवरेज व गंदी नालियों की सफाई, कूड़ा-करकट इक्_ा करना, मृत व्यक्तियों व पशुओं का निपटारा करना, नाक में जलन पैदा करने वाली बदबू झेलकर मरे पशुओं की चमड़ी उतारना व समाज के अन्य ऐसे काम हैं, जिनके बारे में कोई भी आदमी/औरत कभी भी आरक्षण की मांग नहीं करता। यह कार्य ‘‘भाई लालो के वंशज इन धरती-पुत्रों-पुत्रियों’’ के ही हिस्से आया है। परंतु ऐसे समस्त कार्य करने का मुआवजा है : नफरत, बेइज्जती, छुआ-छात, खाने-पीने के लिये अलग बर्तन, पानी के लिये अलग जल-स्रोत्र, पूजा के लिये अलग धर्मस्थान, यहां तक कि मृतकों को जलाने के लिये अलग श्मशानघाट, जो कि सर्वाधिक असहनीय हैं। जाति-पाति पर आधारित गाली-गलौज, अपमान, हिंसक हमले व दलित औरतों के साथ हर तरह के शरीरिक अपराधों की तो कोई सीमा ही नहीं। उच्च जातियों या धनवान लोगों द्वारा प्रशासन से मिलीभगत के परिणामस्वरूप हमेशा ही दलितों व निम्न जातियों से संबंधित लोगों की झुग्गीयां व गरीब बस्तियां ही अग्नि की भेंट होती हैं। ऐसे किसी अपराध या ज्यादती के विरुद्ध खड़े होने की सजा उन्हें कई बार गांव या मोहल्ले से निष्कासित करने के रूप में भी दी जाती है।
यह तो यकीनन ही उत्साहवद्र्धक बात है कि 2 अप्रैल के ‘भारत बंद’ को देश भर में विशाल जन समर्थन मिला है। दलित समाज से बाहरी संवंदनशील व मानववादी सोच के धारक जन समूहों ने भी इस विरोध कार्यवाही में अपने संगी साथियों को साथ लेकर व्यापक समर्थन दिया है। किसी शरारती तत्व द्वारा कोई हिंसक या आपत्तिजनक कार्यवाहीयुक्त छिट पुट घटना हो सकती है जो किसी भी जन-कार्यवाही में होना आम बात है (संघ परिवार से संबंधित सेनाओं द्वारा नित्य ही ऐसी कार्यवाहियां आम ही की जाती हैं)। पर नोट करने वाली बात है कि सबसे अधिक हिंसक घटनायें व मौतें भाजपा शासित राज्यों (यू.पी., मध्य प्रदेश, राजस्थान) में ही हुई हैं। इसके कारणों को जानना भी कोई जटिल कार्य नहीं है। परंतु इस बात को गहरी चिंता व दुख से महसूस किया जाना चाहिए कि मेहनतकश या पीडि़त जन समूहों द्वारा किये गये किसी रोष एक्शन (भारत बंद जैसे) के दौरान हुई जान-माल की क्षति व लोगों को पेश आई मुश्किलों की तो मीडिया व अन्य प्रचार साधनों में हमेशा मसाले लगा लगाकर निंदा की जाती है; जबकि हर दिन सरकार की जन विरोधी नीतियों व भ्रष्ट कार्यवाहियों के कारण देश के लोगों का जो अरबों-खरबों का धन लूटा जा रहा है तथा हजारों लोग भूख, बीमारियों व अन्य आर्थिक तंगियों के कारण असमय मौत के मुंह में जा रहे हैं, उनका तो बहुत बार जिक्र तक नहीं किया जाता। इस पक्षपाती व्यवहार से ही समझा जा सकता है कि मौजूदा ढांचे का चरित्र मेहनतकश लोगों के प्रति कितना निरपेक्ष, आजाद व तर्कसंगत है। अब देश भर में ‘भारत बंद’ में भाग लेने वाले लोगों के विरुद्ध झूठे मुकदमे दर्ज किये जा रहे हैं। घोर अपराधियों, घृणाजनक मुलाजिमों व उनकी बांदी सरकारों द्वारा अपने अधिकारों की लड़ाई लडऩे वाले बेगुनाह लोगों के साथ यह व्यवहार ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली कहावत को स्पष्ट रूप से चरितार्थ करना है।
मनुवादी अत्याचार की बुनियाद
समाज विज्ञान के नजरिये से जाति-पाति प्रथा व सामाजिक उत्पीडऩ की त्रासदी पूर्व-पूंजीवादी व्यवस्था की उपज है। मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था ने अपनी बनती सामाजिक व ऐतिहासिक भूमिका नहीं निभाई तथा प्रतिक्रियावादी सामंंती अर्थव्यवस्था व इस पर निर्मित सामाजिक-सांस्कृतिक ‘ढांचे’ को नष्ट नहीं किया। इसके विपरीत पूंजीवादी अर्थव्यवस्था, जब खुद साम्राज्यवादी दौर में पहुंच कर गंभीर आर्थिक संकट का शिकार हो गई है, तब इसने पतनशील सामंतवाद को खत्म करने का मार्ग त्याग कर इससे सहयोग कर लिया है। देश में वित्तीय पूंजी के स्तर पर पहुंच चुके पूंजीवादी ढांचे ने ऐतिहासिक तौर पर अपने प्रारंभिक पूंजीवादी प्रगतिशील चरित्र को पूर्ण रूप से त्याग कर आाजादी, जनवाद व समानता के आदर्शों का बलिदान दे दिया है। साथ ही इस द्वारा अपनी सार्थकता गंवा चुके सामंतवादी व अद्र्ध-सामंतवादी मुल्यों तथा सामाजिक व सांस्कृतिक सरोकारों को पूर्ण रूप से संरक्षण दिया जा रहा है इन परिस्थितियों में भारत के भीतर पूर्व-पूंजीवादी व्यवस्था की जाति-पाति जैसी कुप्रथायें कायम ही नहीं, बल्कि नित्य प्रति बढ़ती जा रही हैं। इससे भी आगे जाकर नरेंद्र मोदी की सरकार व संघ परिवार द्वारा तो देश में मनुवादी व्यवस्था को पुर्न: स्थापित करने के प्रयत्न किये जा रहे हैं। जिसके फलस्वरूप यह सामाजिक उत्पीडऩ दिन-प्रति दिन बढ़ता व और अधिक पाशविक रूप धारण करता जा रहा है। देश के क्रांतिकारी पक्षों, जिन्होंने भारत में पूंजीवादी-व्यवस्था की समाप्ति के साथ-साथ सामंती-सांस्कृतिक व्यवस्थाओं को भी नष्ट करना होगा। इस उद्देश्य के लिये पूर्व-पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के अधीन पनपे जाति-पाति, छुआ-छूत व अन्य अमानवीय रस्मों-रिवाजों को समाप्त करना भी समूचे वर्गीय संघर्षों का अभिन्न अंग समझा जाना चाहिए। इनके विरुद्ध संघर्ष किये बिना प्रतिक्रियावादी मनुवादी व्यवस्था से पीडि़त जनसमूहों को पूंजीवाद के विरुद्ध लड़े जा रहे संघर्ष का भागीदार नहीं बनाया जा सकता। यह कार्य समाज के इस अति पीडि़त भाग (दलितों व अन्य पिछड़ी जातियों के लोगों) के प्रति दर्शायी जाने वाली दयालुता या तरस की भावना के अधीन नहीं, बल्कि क्रांतिकारी शक्तियों द्वारा पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त करके समाजवादी व्यवस्था की स्थापना के लिये लड़़े जा रहे युद्ध की सफलता के लिये एक कुंजीवत कार्य है।
वामपंथी शक्तियों की जिम्मेदारी
दलित समाज को सामाजिक उत्पीडऩ के विरुद्ध संघर्ष में खींचने के लिये वामपंथी व जनवादी शक्तियों ने जहां अपनी वर्गीय जिम्मेवारी निभानी है, वहीं दलित आंदोलन को किसी जाति-पाति या अलगाववादी राजनीतिक धारा में शामिल होने से रोकने व इसे समूचे जनवादी आंदोलन का अंग बनने के लिये तैयार करने के लिये भी पूरी ताकत लगानी होगी। पूंजीवादी शक्तियों से दलित समाज समेत समूचे मजदूर वर्ग व अन्य मेहनतकश लोगों को जितना खतरा है, उतना खतरा उन्हें जाति-पाति व अलगाववादी राजनीतिक व सामाजिक शक्तियों से भी है, जो दलित शक्ति को अपने संकुचित स्वार्थी हितों की पूर्ति के लिये इस्तेमाल करना चाहते हैं तथा इसे मौजूदा लुटेरे पूंजीवादी ढांचे के भीतर की कुछ नगण्य सी दान रूपी सुविधायें देकर बाकी दुखों-दर्दों भरी जिंदगी को सहन करने के अभ्यस्त बनाना चाहते हैं। आर्थिक रूप से लूटे जा रहे तथा सामाजिक उत्पीडऩ से दो-चार हो रहे दलित भाईचारे को इस तथ्य से भी चेतन करना होगा कि सामाजिक उत्पीडऩ व आर्थिक तंगियों को समाप्त करने के लिए मजदूर वर्ग का राजसत्ता पर कब्जा होना जरूरी है, जो समूचे मजदूर वर्ग (जिसका दलित समाज एक अति महत्त्वपूर्ण व अटूट अंग है) के साथ अन्य भूमीहीन श्रमिकों व गरीब किसानों की मजबूत एकता बनाकर दृढ़तापूर्ण संघर्ष के बिना असंभव है। समाज के समस्त उत्पादन साधनों पर कब्जे की जंग जीतनी मजदूर वर्ग व किसानों की ‘विशाल एकता’ से ही संभव है, जिस जीत के बाद आर्थिक लूट-खसूट के साथ-साथ सामाजिक अन्याय की भी अवश्य समाप्ति हो सकेगी। इस सामाजिक उत्पीडऩ का एक कारण दलित समाज का उत्पादन साधनों से वंचित होना भी है। इसके साथ ही, गैर दलित मजदूर वर्ग, किसानों व अन्य जनवादी तबकों को दलितों की सामाजिक उत्पीडऩ विरोधी लड़ाई के विरुद्ध खड़े होने की जगह उन्हें पूर्ण रूप में सहयोग करने के मार्ग पर चलाना भी क्रांतिकारी पक्षों की एक महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी है। अधिकतर जाति-पाति आधारित सामाजिक उत्पीडऩ की पूर्ण अनुभूति गैर दलित मजदूर वर्ग या अन्य मेहनतकश लोगों को नहीं होती।
अनुचित आलोचना
इसीलिए कई बार वोटों के चतुर व्यापारियों द्वारा आरक्षण के विरोध या पक्ष में नये-नये नारे उभारे जाते हैं। जिनके कई भोले भाले व साधारण लोग भी अक्सर शिकार बन जाते हैं। विशाल बेरोजगारी के इस दौर में कई बार ऐसे दंभी नारे थोड़ी बहुत सफलता भी प्राप्त कर जाते हैं। ऐसे कुछ लोगों द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध दलितों में फैले व्यापक रोष को भी आरक्षण का रंग चढ़ाने का कुत्सित प्रयास किया गया है। जबकि देश के सर्वपक्षीय विकास के लिए उत्पादक शक्तियों के निर्माण हेतु हजारों वर्षों से हर तरह की सामाजिक-आर्थिक सुविधाओं से वंचित रखे गये अनुसूचित जाति व कबीलों के लोगों के भीतर मानवीय समानता की भावना जगाने के लिए आरक्षण की ऐसी व्यवस्था करना पूरी तरह उचित भी था और आवश्यक भी। परंतु अब तो यह व्यवस्था भी एक सीमा तक निरर्थक हो चुकी है। क्योंकि अब तो केंद्रीय व राज्य सरकारों ने सरकारी व अद्र्ध सरकारी नौकरियों को बड़ी सीमा तक समाप्त ही कर दिया है। जिसके फलस्वरूप किसी भी जाति के जन्में को कोई भी सरकारी नौकरी मिलना बड़ा कठिन बन चुका है। यह कठिनाई जाति आधारित आरक्षण के लिये भी तथा आर्थिक आधार पर आरक्षण के लिये भी समान रूप में चिंताजनक है। यह भी याद रखना जरूरी है कि मोदी-मनमोहन सिंह मारका कारपोरेट मुखी विकास माडल निरा रोजगार ही नहीं बल्कि रोजगार के अवसरों को भी स्पष्ट रूप से लीलता जा रहा है। उदाहरणस्वरूप हर वर्ष यात्री ट्रेनों व मालगाडिय़ों की संख्या व रफ्तार दोनों ही बढ़ाये जा रहे हैं परंतु रेल-कर्मचारियों की संख्या घटा कर आधी कर दी गई है। इन स्थितियों में दोनों मेहनतकश पक्षों को एकजुट करना, राजनीतिक व सैद्धांतिक रूप में जागरूक करना तथा संयुक्त दुश्मन ‘पूंजीवादी ढांचे’ के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष लामबंद करना, क्रांतिकारी आंदोलन का ऐतिहासिक जिम्मा है।
दलित समाज को केवल सफाई कर्मचारियों या ग्रामीण क्षेत्रों में खेत मजदूरों तक सीमित रखना भी गलत होगा। दलित भाईचारा, जो कृषि क्षेत्र में मशीनीकरण के कारण बेकार कर दिया गया है, अब भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में अपनी रोजी-रोटी के जुगाड़ के लिये हाथ-पैर मार रहा है। ओद्यौगिक श्रमिकों, असंगठित मजदूरों के रूप में भिन्न-भिन्न उद्योगों या व्यवसायों व अन्य छोटे-मोटे धंधों, जो बहुत ही निम्न स्तर का असंतोषजनक वेतन दे रहे हों, में दलित श्रमिकों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। इसीलिये दलितों, चाहे वे किसी भी उद्योग में कार्यरत हों या बेकारों की कतार में खड़े हों, उनकी आर्थिक मांगों के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों की ओर भी पूरा-पूरा ध्यान देना होगा। निस्संदेह दलित समाज से संबंधित एक छोटा सा भाग आरक्षण व मौजूदा संविधान में दर्ज अन्य सुविधाओं की मदद से अच्छी जिंदगी व्यतीत करने के योग्य हो गया है। अफसरशाही व शासक वर्गों की कुछ सीटों पर भी समाज के इस अति पिछड़े वर्ग के कुछ लोग बैठे दिखाई दे रहे हैं। परंतु इन चंद लोगों के ऊंचे जीवन स्तर को देख कर या, इसी तरह, हर दलित की मौजूदा संविधान की सीमाओं में ही अच्छा जीवन व्यतीत करने की चाह की पूर्ति हो जाने का सपना लेना, निरा ख्याली पुलाव व अज्ञानता होगी। आर्थिक व सामाजिक रूप में यह मु_ी भर व्यक्ति जब शासक पक्षों के साथ मिलाप कर लेते हैं या उसके नजदीक पहुंच जाते हैं, तब इनका सामाजिक व वर्गीय चरित्र भी काफी हद तक बदल जाता है। यही लोग संविधान की भिन्न-भिन्न धाराओं का उपयोग करते हुये अपने पदों का स्वार्थी हितों की पूर्ति के लिये भी लाभ लेते हैं। परंतु समूचे दलित समाज की दरिद्रता व सामाजिक उत्पीडऩ से मुक्ति के लिये यह आम व्यवहार कदाचित नहीं हो सकता। इसीलिये पूंजीवादी समाज में अन्य मेहनतकशों के साथ-साथ दलित वर्गों से संबंधित श्रमिकों को अपनी मुक्ति के लिये दोहरी लड़ाई लडऩी होगी; पूर्व-पूंजीवादी सामंती व अद्र्ध-सामंती संबंधों व मूल्यों के विरुद्ध लड़ाई तथा पूंजीवादी ढांचे की लूट-खसूट से निजात प्राप्त करने के लिए संघर्ष। दोनों के सुमिश्रण से ही सदियों से शोषित व उत्पीड़त समाज के इस भाग को कोई रौशनी की किरण दिखाई दे सकती है।

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